एक राजनेता के रूप में राहुल गांधी के विकास व उभार को लेकर हमेशा चर्चाएं होती रही हैं। कई बार उनका उपहास उड़ाया जाता रहा है और कई बार अपने बयानों या बातों की वजह से वह विपक्ष के निशाने पर भी रहे हैं। हालांकि इस बार कांग्रेस ने गांधी परिवार से बाहर जाकर मल्लिकार्जुन खरगे को संगठन की बागडोर सौंपी है, लेकिन वह अब भी उत्थान के लिए जहां राहुल गांधी से ही उम्मीद रखती नजर आती है, वहीं उसे यह चिंता भी है कि नरेंद्र मोदी जैसे सधे हुए नेता का सामना वह कैसे कर पाएगी। जैसे कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी किताब ए प्रॉमिस्ड लैंड में लिखा है कि 'राहुल में उनका एक नर्वस, अनफॉर्म्ड गुण था, जैसे कि ऐसा छात्र जिसने पाठ्यक्रम पढ़ा था और शिक्षक को प्रभावित करने के लिए उत्सुक था, लेकिन भीतर ही भीतर या तो योग्यता या विषय में महारत हासिल करने के उसके जुनून में कमी थी।'
तो क्या माना जाए कि यह यात्रा राहुल की उस कमी को दूर करने के लिए, उनकी रीपैकेजिंग के लिए है? काफी पैसा खर्च करके, अच्छे प्रबंधन के साथ इस यात्रा का संचालन हुआ है। यात्रा कहां से गुजरनी है, किसे यात्रा में शामिल किया जाना है और कहां राहुल को किन मुद्दों को छूना है, किन पर केंद्रित रहना है, सब सुनियोजित है, 'नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने आया हूं' जैसा बयान भी, दाढ़ी बढ़ाना भी और आधी बांह की उनकी सफेद टी शर्ट भी। विपक्ष बेशक इसे लेकर उन पर कई सवाल उठा रहा हो, लेकिन उन्होंने इसे भी अपना हथियार बना लिया। उन्होंने कहा कि जो लोग टी शर्ट को लेकर तंज कस रहे हैं, वे उन लोगों का अपमान कर रहे हैं, जिनके तन पर कपड़ा भी नहीं होता। केवल भौतिक रूप में ही नहीं, समझ, सोच, संयम व ज्ञान में परिपक्वता दर्शाना और पिछली छवि को तोड़ना एक उल्लेखनीय बदलाव है। राहुल की यह यात्रा उनके लिए भारत जोड़ो के साथ-साथ भारत को जानो भी है।
गांधी-नेहरू की विरासत पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने से परहेज करते हुए, मीडिया के सामने आत्मविश्वास दिखाते हुए वह सीधे विपक्ष पर हमलावर नहीं हो रहे, जैसे पहले होते रहे हैं और जिसका उन्हें व कांग्रेस को नुकसान होता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला करना वह सही नहीं समझ रहे। इसी तरह अब अदाणी या अंबानी का नाम लिए बिना राहुल सवाल करते हैं कि भारत की संपत्ति कुछ चुनिंदा व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित है, जो सत्ता से जुड़े हुए हैं। समाज को जोड़ने के उनके नारे के पीछे सांप्रदायिक बयानबाजी करके राजनीतिक सत्ता हासिल करने की आसान राह वाले समय में सद्भावना का संदेश देकर प्रेरित करना है। इसी तरह अब हिंदुत्व या राम मंदिर जैसे मुद्दों पर वह सीधे-सीधे भाजपा की आलोचना नहीं करते। वह इस वास्तविकता से परिचित हो चुके हैं कि हिंदुत्व की मौजूदा सत्ता-विचारधारा ने वर्चस्व और दक्षता का वह स्तर हासिल कर लिया है जो दीर्घकालिक प्रतीत होता है। इसलिए राहुल यह जताने का प्रयास करते हैं कि उनका इरादा प्रतिवाद से आगे का है।
रही बात कांग्रेस की, तो लगभग तीन हजार किलोमीटर की इस यात्रा का उसके पास 'टेक अवे' पार्टी के सर्वमान्य नेता के रूप में राहुल की स्वीकार्यता बढ़ाना तो है ही। कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने के साथ ही प्रदेश या देश के आला नेताओं में भी यह आत्मविश्वास उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि बेशक पार्टी देश में बुरे दौर से गुजर रही हो, लेकिन संगठन अभी प्राणवान है। कुछ उन वर्गों के लोग भी इस यात्रा से जुड़ने में रुचि दर्शाते नजर आए हैं, जो अब तक खुलकर आने से परहेज करते रहे हैं।
लेकिन यात्रा के बाद क्या होगा...। यात्रा का बड़ा लक्ष्य जब सवा साल बाद होने वाला लोकसभा चुनाव है, तो यह चिंता पार्टी के थिंकटैंक को भी है। इसलिए आगामी 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर श्रीनगर में झंडा फहराने के बाद भी हाथ जोड़ो कार्यक्रम आदि के जरिये राहुल गांधी व संगठन को इसी तरह सक्रिय रखने की तैयारी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता यह मानते हैं कि राज्यों में गुटबाजी कम करना बड़ा काम होगा। इसे राहुल भी भांप चुके हैं। इसलिए कार्यकर्ताओं को संदेश देते हैं वह कि कर्म करें। समाज को जोड़ने के यात्रा के घोषित लक्ष्य में निहित कांग्रेस को एकजुट करने के अघोषित उद्देश्य की कितनी पूर्ति होगी, कर्म करने के राहुल के संदेश से कांग्रेस की कार्यसंस्कृति वाकई कितनी बदलेगी, इसका अंदाजा अभी न तो पार्टी को है, न ही राहुल गांधी को। कुरुक्षेत्र में वह खुद ही कह चुके हैं कि नफा होगा या नुकसान, पता नहीं, जो होना है होगा ही...गीता यही कहती है।