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राजनीति में कुंवारों का क्रेज

Sun, 06 Apr 2014 05:27 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
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साधो, राजनीति में इन दिनों जित देखूं तित कुंवारों का आलम है। मजाल है कि इनके सामने कोई ब्याहा चूं-चपड़ कर दे। इनको इतना वक्त ही नहीं मिला कि ब्याह के बारे में सोचते। देश सेवा को ही उन्होंने अपना चिर संगी-साथी बना लिया है। अब वे उसी में फुल टाइम मग्न हैं।
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हैरत की बात है कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी खुद को गैरशादीशुदा बताते हैं, जबकि उनकी संगिनी होने का दावा करने वाली महिला सामने आ चुकी हैं। लाल किले से भाषण देने के बारे में सिर्फ मोदी ही नहीं सोच रहे। जयललिता, नवीन पटनायक, राहुल गांधी, मायावती और ममता बनर्जी तक खुली आंखों दिल्ली तक पहुंचने के सपने देख रही हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से यह भरोसा बढ़ गया है कि कुंवारे रहकर भी सत्ता के केंद्र तक पहुंचा जा सकता है। राहुल बाबा की दाढ़ी के बाल अब सफेद होने लगे हैं, पर उन्हें सात फेरों की फिक्र नहीं। राजनीति का नशा होता ही ऐसा है कि सब कुछ बेस्वाद लगने लगता है। मंच, माइक, रोड शो, रैलियां, टोपियां, झंडे, बैनर, गाड़ियों के काफिले, जिंदाबाद के स्वर और गले में मालाएं। कभी-कभी काले झंडे या चेहरों पर कालिख।
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राजनीति के रमता जोगियों का यही अखाड़ा है। इस चुनावी मौसम में यहां उछल-कूद तेजी पर है। पार्टियां चलाना मेंढक तौलने जैसा है। तेरह कूदे, तो लालू ने झपटकर नौ दबोच लिए। बाकी हाथ नहीं आए। वैसे दलों के भीतर अनुशासन रखने में कुंवारों का जवाब नहीं। वे शादी का मसला छोड़ बाकी सारी फैसले त्वरित ढंग से लेते हैं। राहुल से एक बार किसी ने शादी के बारे में पूछा, तो वह मुस्कराकर सवाल टाल गए, पर इस सवाल से उनके गाल पर पड़ने वाला गड्ढा कुछ ज्यादा गहरा हो गया, जिसे कुंवारे पत्रकारों ने गौर से देखा।

बहरहाल, चुनाव आयोग ने मंडप सजा दिया है। कुंवारे और शादीशुदा लोग बैंड-बाजे लेकर निकल पड़े हैं। पर दिल्ली की दुल्हनियां तो एक के गले में ही वरमाला पहनाएगी। बाकी को बैरंग लौटना पड़ेगा।
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