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कोरोना काल के बीच दवा बाजार को बदल देगा आयुर्वेद

जयंतीलाल भंडारी Published by: जयंतीलाल भंडारी Updated Fri, 20 Nov 2020 06:23 AM IST
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ayurveda

कोविड-19 की चुनौतियों के बीच आयुर्वेदिक बाजार के तेजी से आगे बढ़ने का सुकून भरा परिदृश्य दिखाई दे रहा है। विगत 13 नवंबर को पांचवें आयुर्वेद दिवस के अवसर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रस अधानोम घेब्रेसस ने घोषणा की कि डब्ल्यूएचओ भारत में पारंपरिक दवाओं के एक वैश्विक केंद्र की स्थापना करेगा और इससे विश्व के विभिन्न देशों में परंपरागत और पूरक दवाओं के अनुसंधान, प्रशिक्षण और जागरूकता को मजबूत किया जा सकेगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आयुर्वेद भारत की विरासत है, जिसके विस्तार में पूरी मानवता की भलाई समाई हुई है। उन्होंने उम्मीद जताई कि पारंपरिक दवाओं का यह केंद्र भारत में वैश्विक स्वास्थ्य का केंद्र बनेगा। 



गौरतलब है कि कोरोना महामारी के वैश्विक संकट के दौरान भारत के सदियों पुराने आयुर्वेद को दुनिया भर में अपनाया गया है। भारत सरकार ने कोविड-19 से लड़ने के प्रयासों में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आयुर्वेदिक संघटकों के उपयोग की सफल रणनीति बनाई है और दुनिया के कई देशों को आयुर्वेदिक दवाइयों और मसालों का निर्यात किया है। आयुर्वेद मार्केट से संबंधित प्रसिद्ध मैक्सिमाइज मार्केट रिसर्च के मुताबिक, भारत में आयुर्वेदिक दवाइयों का बाजार आकार वर्ष 2019 में करीब 4.5 अरब डॉलर मूल्य का था, जो वर्ष 2026 तक बढ़कर 14.9 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। देश और दुनिया में आयुर्वेद का बाजार निश्चित रूप से बढ़ रहा है, लेकिन कई ऐसी चुनौतियां हैं, जो इस बाजार को ऐलोपैथिक बाजार जैसी ऊंचाइयों से रोकते हुए दिखाई दे रही हैं। ये चुनौतियां आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था से संबंधित हैं। 


आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति अत्यधिक जटिल व निषेधात्मक है। आयुर्वेदिक दवाओं की प्रभावकारिता का पूर्वानुमान करना भी कठिन कार्य है। अत्यधिक गंभीर संक्रमण और अन्य आपात स्थितियों में आयुर्वेद की न्यून प्रभावकारिता आयुर्वेदिक दवाइयों के बाजार को सीमित कर देती है। कई बार आयुर्वेदिक दवाओं की बेहतर बाजार हिस्सेदारी के लिए कई आयुर्वेदिक दवा कंपनियां पर्याप्त वैज्ञानिक आधार के अपने उत्पादों के बारे में जिस तरह चमत्कारिक दावों को प्रचारित करती हैं, उनके प्रामाणिक न होने पर आयुर्वेदिक बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उल्लेखनीय है कि कई बार अमेरिका और यूरोपीय देशों में बेची जाने वाली कुछ आयुर्वेदिक दवाओं में आर्सेनिक, मरकरी, लेड आदि के अतिशय प्रयोग पर चिंता व्यक्त की गई और कहा गया कि इन भारी धातुओं का अतिशय प्रयोग स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है। ऐसे विभिन्न कारणों से दुनिया के कई देशों में आयुर्वेद को लोकप्रियता प्राप्त नहीं हो पाई है और इससे दुनिया में आयुर्वेदिक बाजार अपेक्षा के अनुरूप आगे नहीं बढ़ पाया है।


इस समय जब डब्ल्यूएचओ ने भारत में पारंपरिक दवाओं के वैश्विक केंद्र की स्थापना सुनिश्चित की है, तब भारत के आयुर्वेदिक दवाइयों के बाजार के बढ़ने की नई संभावनाएं निश्चित रूप से बढ़ी हैं। चूंकि भारत दुनिया में औषधीय जड़ी-बूटियों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और इसे बॉटनिकल गार्डन ऑफ द वर्ल्ड यानी विश्व का वनस्पति उद्यान कहा जाता है, ऐसे में देश में औषधीय गुणों से भरपूर सैकड़ों तरह के पौधों के अधिकतम उत्पादन की नई रणनीति बनाई जानी होगी। देश में तुलसी, अदरक, लौंग, काली मिर्च, बिल्वपत्र, नीम पत्ता, पान पत्ता, तेज पत्ता, जामुन पत्ती, सोम पत्ती जैसी सैकड़ों जड़ी-बूटियों का उत्पादन कार्य बढ़ाया जाना होगा। केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों द्वारा भी किसानों को जड़ी-बूटी एवं औषधि खेती के विस्तार के लिए और अधिक प्रोत्साहन दिए जाने होंगे।


आयुर्वेदिक दवाइयों के बाजार को बढ़ाने के लिए कई और बातों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है। आयुर्वेदिक दवाओं के लिए उपयुक्त नियमन व्यवस्था सुनिश्चित करने के साथ ही आयुर्वेदिक इलाज की प्रक्रियाओं का मानक भी तय करना होगा। वास्तव में आईटी की तरह आयुर्वेद का क्षेत्र भारत के लिए विदेशी मुद्रा की कमाई का नया जरिया बन सकता है।

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