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महंगाई का दौरा पड़ा है

Mon, 30 Jun 2014 07:21 PM IST
अशोक गौतम
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कल सुबह ज्यों ही कांपते हाथों से अखबार खोल महंगाई बढ़ने की खबर मैंने आधी-अधूरी भर पढ़ी कि मेरे मुंह से एकाएक झाग-सी निकलने लगी। हाथ-पांव सुन्न होने लगे। बचा-खुचा दिमाग चकराने लगा।
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पत्नी ने इस बार हड़बड़ाहट का परिचय नहीं दिया। इसके बजाय वह बड़बड़ाने लगी। प्रीकॉशन के लिए उसने एक सौ आठ नंबर पर आपातकालीन कॉल करने की भी जरूरत महसूस नहीं की। असल में हमारे घर में अब एक सौ आठ नंबर वाले आते-आते ऊब गए हैं। वे जानते हैं कि इस घर के मुखिया को हर चौथे दिन दौरा पड़ता ही रहता है। पिछली दफा तो उन्होंने साफ कह दिया था कि हमें महंगाई के मारे हुए और लोगों को भी अस्पताल ले जाना है। एक ही बंदे का हमने ठेका नहीं ले रखा है।

मैं जरा ठीक हुआ, तो अपने ही पैरों पर चलकर अस्पताल जा पहुंचा। सरकारी डॉक्टर को बड़ी मुश्किल से अस्पताल में ढूंढ पाया। मिलते ही वह गुर्राए, क्या प्रॉब्लम है?
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साहब! मेरे हाथ-पांव नीले पड़ रहे हैं, बदन मरा जा रहा है।

बदन तो होता ही नश्वर है। फाइव एलिमेंट से जो बना है। अखबार पढ़ते होंगे आप सुबह-सुबह?

हां साहब। बस जिंदगी में एक यही ऐब बची है।

ये अखबार ही तो लोगों को बीमार बना रहे हैं। सुबह-सुबह ये महंगाई का ऐसा ओवरडोज देते हैं कि स्वस्थ आदमी की आंखों के आगे भी अंधेरा छा जाता है। आखिर आपको हुआ क्या है?

जी, आंखों के आगे कमजोरी-सी छा रही है!

पर दिल का दौरा तो मुझे लग नहीं रहा।

मुझे लगा कि आज मैं पहली बार किसी सही डॉक्टर के शिकंजे में चढ़ा हूं। सो खुश होने के बाद बोला, असल में मैंने सुबह जब महंगाई की खबर अखबार के पहले पन्ने पर पढ़ी, तो जोर का एक झटका जैसा लगा।
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ओ आई सी। मतलब आपको महंगाई का दौरा पड़ा है। अरे, यह भी कोई दौरा है!

पर साहब, जरा चेक कर लेते, तो मन को तसल्ली मिलती।

पर मुझे सब कुछ ओके लग रहा है। जाइए, इंज्वॉय कीजिए।
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