कुछ देर के लिए मान भी लें कि चूंकि विकास दुबे की गाड़ी पलट गई थी, वह एनकाउंटर में मारा गया था, इसलिए अतीक अहमद के साथ भी ऐसा हादसा हो सकता था, इसे देखते हुए न्यूज चैनलों ने अहमदाबाद से प्रयागराज तक अतीक को एस्कॉर्ट किया। इसका एहसान भी अतीक ने चुकाया। उसने कहा कि मीडिया की वजह से ही वह सकुशल पहुंच सका। पर उसके बाद हर बार अतीक के सामने आते ही मुंह में माइक डालने की जरूरत क्यों आन पड़ी?
अतीक कोरोना की अगली लहर से बचने का तरीका बताने वाला नहीं था। न ही वह महंगाई, बेरोजगारी दूर करने का फॉर्मूला ईजाद करने वाला था। वह न तो जेल में कैदियों की दुर्दशा पर व्याख्यान देने वाला था, न पुलिस सुधार पर कुछ ज्ञान देने वाला था। आखिर अतीक अहमद जैसे हत्यारों और आरोपियों की साउंड बाइट ली ही क्यों जाती है? इससे भी बड़ा सवाल है कि पुलिस ने साउंड बाइट लेने ही क्यों दी। अगर हत्यारे हत्या करने के बाद गोली चलाते हुए वहां से भागने की कोशिश करते, तो क्या होता? अफरा-तफरी का आलम था। नीम अंधेरा था। कैमरामैन और रिपोर्टर इधर-उधर भाग रहे थे। ऐसे में हत्यारे भागने की कोशिश में पुलिस पर गोली चलाते, तो पुलिस भी जवाब में गोली चलाती। तब कैमरामैन भी चपेट में आ सकते थे और लाइव रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर भी। वैसे में, पे रोल पर काम करने वाले मीडियाकर्मियों के परिजनों को तो बीमा राशि मिल जाती, पर बाकी के स्ट्रिंगरों, डिजिटल मीडिया वालों का क्या होता?
इससे सबक लेते हुए न्यूज चैनल के मालिक-संपादक क्या नए दिशा-निर्देश जारी करेंगे? कायदे से तो इंडियन ब्रॉडकास्ट स्टैंडर्ड अथॉरिटी को अब तक बैठक कर फैसला कर लेना चाहिए, पर ऐसा कुछ होने वाला नहीं। उल्टे एक चैनल ने लाइव मर्डर शूट करने वाले कैमरामैन और रिपोर्टर को पांच लाख रुपये का इनाम दिया है। तो क्या यह माना जाए कि आगे से अतीक जैसे हत्यारों की कवरेज करने वाले बुलेट प्रूफ जैकेट पहन कर जाएंगे और जाबांज रिपोर्टिंग के नमूने पेश करेंगे? इस घटना पर कई चैनलों के पुराने साथियों से बात हुई। उन्होंने याद दिलाया कि पुलिस ऐसे मामलों में पूरी जानकारी नहीं देती, लिहाजा चैनलों को सूत्रों का सहारा लेना पड़ता है, मजबूरी में अपुष्ट सूचनाएं देनी पड़ती है। वर्ष 2010 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों से आग्रह किया था कि संवेदनशील मामलों में आरोपियों या मुजरिमों की मीडिया परेड नहीं होनी चाहिए। साथ ही, ऐसे मामले में अलग से एक पुलिस अधिकारी की नियुक्ति होनी चाहिए, जो मीडिया के सवालों का जवाब दे।
पर ऐसा होता नहीं है। इसलिए न्यूज चैनल वह सब कर गुजरते हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिए। इसका अंजाम अतीक कांड जैसा हो जाता है। अब तो बच्चा-बच्चा जान गया है कि एक कैमरा, एक माइक और गले में एक चैनल का पट्टा आपको अतीक जैसे लोगों के करीब ले जाने के लिए काफी है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। तीन साल पहले यूक्रेन में एक मशहूर हस्ती की हत्या की सुपारी रूसी एजेंसियों ने चेचन्या के एक भाड़े के हत्यारे को दी थी, जो फ्रांस के एक अखबार का प्रतिनिधि बन अपने टारगेट से मिला था। पिछले साल जापान में शिंजो आबे की हत्या करने वाला भी मीडिया प्रतिनिधि होने के नाते पूर्व प्रधानमंत्री के करीब पहुंचने में कामयाब हुआ था। मेक्सिको में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ड्रग माफिया ने टीवी पत्रकार के भेष में चुनाव रैली में शूटर भेजा था। क्या सब यह सोच रहे हैं कि अगला लाइव मर्डर किसका होगा? या चैनल वाले अतीक जैसे हत्यारों से दूरी बनाकर रहेंगे?