दूसरा— अतीक अहमद ने अपना पहला अपराध 1970 के दशक में 17 वर्ष की आयु में किया था। वर्ष 1989 में अतीक राजनीति में उतरा और अगले तीन दशकों तक एक भी अपराध में उसका दोषसिद्ध नहीं सका। क्यों? इसका उत्तर 2012 के उस घटनाक्रम में मिलता है, जिसमें अतीक की जमानत याचिका पर सुनवाई करने से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 10 न्यायाधीशों ने स्वयं को अलग कर लिया था। क्या यह सब अतीक के खौफ के समक्ष तत्कालीन न्यायिक प्रणाली का बेबस चेहरा पेश नहीं करता?
बीते 44 साल में 150 आपराधिक मुकदमे दर्ज होने के बाद अतीक और अशरफ को पहली बार उसके खिलाफ दर्ज एक मामले में 28 मार्च, 2023 को दोषी ठहराया गया। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि मार्च 2017 से पहले जो राजनीतिक संरक्षण अतीक और उसके परिवार को प्राप्त था, वह योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार की अपराध के खिलाफ सख्त नीतियों से एकाएक समाप्त हो गया।
तीसरा— प्रयागराज में 15 अप्रैल को अनिवार्य चिकित्सा जांच हेतु पुलिस सुरक्षा में अतीक-अशरफ को अस्पताल लाया गया था। तब उसे मीडिया से बात करने की स्वतंत्रता दी गई। कई अवसरों पर अहमद बंधु अपनी जान पर खतरा बता चुके थे। इस स्थिति में प्रदेश सरकार और पुलिस का रवैया समझ से परे है। दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के तीन अलग-अलग क्षेत्रों से आए ये तीनों हत्यारे अतीक-अशरफ को मारकर 'बड़ा माफिया' बनना चाहते थे। यह स्वीकारोक्ति संदिग्ध प्रतीत होती है। यदि तीनों को 'बड़ा माफिया' बनना ही था, तो वे घटनास्थल पर तैनात भारी पुलिसबल के बीच इतना बड़ा कांड कर भागने का प्रयास करते, किंतु उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। तीनों के पुलिसिया मुठभेड़ में मारे जाने की आशंका प्रबल थी। हत्यारे साधारण परिवार से आते हैं, तो उनके पास लाखों रुपयों की प्रतिबंधित विदेशी पिस्टल कहां से आई?
नैरेटिव बनाया जा रहा है कि हमलावरों ने 'जय श्रीराम' का नारा लगाकर अतीक-अशरफ को मारा। यह अकाट्य सत्य है कि मोदी सरकार के साथ प्रदेश की योगी सरकार सांस्कृतिक विकास में मुख्य भूमिका निभा रही है। कुछ माह पहले सपा-राजद नेताओं द्वारा रामचरितमानस को कलंकित करने के बाद अतीक-अशरफ की हत्या में हमलावरों द्वारा उपरोक्त नारा लगाना कहीं मोदी-योगी सरकार और हिंदुत्व को कलंकित करने के शृंखलाबद्ध अभियान का हिस्सा या अतीक-अशरफ हत्याकांड की जांच को भटकाने हेतु तो नहीं है?
कई विरोधी दल अतीक-अशरफ की हत्या को 'मुस्लिम समाज पर हमला' और 'मुसलमानों पर तथाकथित राजकीय शोषण' बता रहे है। मुस्लिम समुदाय की पहचान अतीक-अशरफ जैसे कुख्यात अपराधियों से होगी या मौलाना अबुल कलाम आजाद, एपीजे अब्दुल कलाम और ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान से? क्या यह सत्य नहीं कि अतीक-अशरफ द्वारा शिकार 20 प्रमुख पीड़ितों में से 13 मुस्लिम समाज से हैं? उपरोक्त नैरेटिव भारतीय सार्वजनिक जीवन में आई विकृति को ही रेखांकित करती है। अतीक-अशरफ की हत्या से पहले 12 अप्रैल को पुलिसिया मुठभेड़ में अतीक का कुख्यात बेटा असद मौत के घाट उतार दिया गया था। तब इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'मुस्लिम शोषण' का मुद्दा बनाकर प्रस्तुत किया गया।
यह स्थिति तब थी, जब इस मुठभेड़ से एक दिन पहले उत्तर प्रदेश पुलिस ने ढाई लाख के इनामी बदमाश आदित्य राणा को मुठभेड़ में ढेर कर दिया था। इस तरह की लंबी सूची है। सच यह है कि पुलिस और कोई भी सुरक्षा एजेंसी किसी को शत-प्रतिशत सुरक्षा नहीं दे सकती। विश्व के सबसे आधुनिक, शक्तिशाली और संपन्न अमेरिका के चार राष्ट्रपति कड़ी सुरक्षा के बाद भी मौत के घाट उतार दिए गए। भारत में एक प्रधानमंत्री (दिवंगत इंदिरा गांधी) और पूर्व प्रधानमंत्री (दिवंगत राजीव गांधी) की भी सुरक्षा चक्र में होते हुए नृशंस हत्या हो चुकी है।
जो समूह अतीक-अशरफ-असद प्रकरण को कानून-व्यवस्था के ध्वस्त होने से जोड़ रहे है, वे लखनऊ में कमलेश तिवारी को अशफाक-मोइनुद्दीन सहित छह जिहादियों द्वारा मौत के घाट उतारने और पालघर में पुलिस बल की उपस्थिति में हिंसक भीड़ द्वारा दो निरीह हिंदू साधुओं की नृशंस हत्या पर अब तक मौन हैं। उत्तर प्रदेश की हालिया घटनाएं और उस पर आ रही प्रतिक्रियाएं— हमारी व्यवस्था में दशकों से व्याप्त सड़ांध को ही उजागर करती हैं।