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विधानसभा चुनाव 2022: लोकतंत्र पर हावी होता वोटतंत्र

वीर सिंह
Updated Mon, 14 Feb 2022 07:33 AM IST

सार

लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला और उसको सर्वोत्तम व्यवस्था के रूप में समझने वाला कोई भी संवेदनशील व्यक्ति यह स्वीकार नहीं करेगा कि वोटतंत्र राष्ट्र की अखंडता पर ग्रहण बनता चला जाए। लेकिन सच्चाई यह है कि लोकतंत्र में नकारामकता की गूंज अधिक सुनाई पड़ने लगी है और चुनाव-दर-चुनाव वह राष्ट्रीय मर्यादाओं को अधिकाधिक रौंदती चलती है।
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मतदान (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : istock


जहां लोकतंत्र नहीं, वहां विश्व संस्थाओं द्वारा लोकतंत्र स्थापित करने के लिए परामर्श से लेकर धमकियां तक दी जाती हैं। लोकतंत्र का सीधा-सा अर्थ, जो हमारे मस्तिष्क तंतुओं में घर बनाए बैठा है, वह है मतदान द्वारा सरकार का गठन। अर्थात, लोकतंत्र तक पहुंचने के लिए वोटतंत्र की रणनीति। यदि वोट के बिना राजकीय व्यवस्था सृजित होती है, तो उसे सीधे-सीधे अधिनायकवादी व्यवस्था मान लिया जाता है और यह सोच लिया जाता है कि वहां मानवाधिकार का हनन हो रहा है। चुनाव पर अपने विश्लेषणों में विश्लेषकों ने शायद ही इस तथ्य को पकड़ा है कि प्रत्येक चुनाव पिछले चुनाव से अधिक विषैला होता जा रहा है। दूसरे शब्दों में, लोकतंत्र को अपनी निरंतर विकास यात्रा का बहुत बड़ा मोल चुकाना पड़ रहा है। अब प्रचार तंत्र के साधन-संसाधन सब बदल गए हैं। दशकों पूर्व समाचार में 'बूथ कैप्चर' के ठेके के समाचार आते थे। अब ठेकेदार बदल गए हैं।


सूचना युग के चुनावी समर में जीत की रणनीतियां बनाने वाले मैनेजर किराये पर लिए जाने लगे हैं। ये कुशल खिलाड़ी चुनाव में उतरे दल को विजयी बनाने के उद्देश्य से 'साम-दाम-दंड-भेद' की नई-नई चालें सिखाते हैं, मतदाताओं के विवेक-हरण के लिए नए नारे, नई लालसाएं पैदा करते हैं। इन चुनावी प्रबंधकों के अपने कोई विचार नहीं होते। जो भी दल इन्हें चारा डाले, उसी के विचार में रम जाते हैं। राजनीति में 'दल-बदलू' एक गाली है। मगर नए ठेकेदारों ने अभी यह गाली अर्जित नहीं की। चुनाव और युद्ध में बस इतना अंतर है कि चुनाव के दिन की भाषा युद्ध काल की भाषा से अधिक विषैली होती जा रही है। पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों के दौरान अनेक नेताओं से लेकर सामान्य जन प्रचारकों तक ने जैसे विषाक्त शब्दों और धमकी-भरी भाषा का प्रयोग किया है, वैसा पहले बहुत कम हुआ है।


उत्तर प्रदेश ने तो सारी सीमाएं ही लांघ दी है। राजनीतिक नैतिकता की लुटिया जैसे इस चुनाव में डूबी है, वैसी पहले शायद ही कभी डूबी हो। मगर यह अंतिम दृश्य नहीं है। लोकतंत्र के भविष्य का राजनीतिक अनैतिकता की धुंध में डूबना निश्चित है। मतदान के माध्यम से लोकतांत्रिक राजकीय व्यवस्था की स्थापना निश्चित ही राजनीति का सर्वोत्तम दर्शन शास्त्र है। परंतु जब वोटतंत्र लोकतंत्र पर इतना हावी हो जाए कि व्यवस्थाएं भी उसके सामने बौनी लगने लगें, ईर्ष्या-द्वेष और वैमनस्य की विषैली हवाएं सभ्यता-संस्कृति को कलुषित करने लगें तथा राष्ट्र के भूगोल में दरार पड़ने लगे, तब राष्ट्र की अक्षुण्णता को सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक रणनीति तैयार करना अवश्यंभावी हो जाता है।


लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला और उसको सर्वोत्तम व्यवस्था के रूप में समझने वाला कोई भी संवेदनशील व्यक्ति यह स्वीकार नहीं करेगा कि वोटतंत्र राष्ट्र की अखंडता पर ग्रहण बनता चला जाए। लेकिन सच्चाई यह है कि लोकतंत्र में नकारामकता की गूंज अधिक सुनाई पड़ने लगी है और चुनाव-दर-चुनाव वह राष्ट्रीय मर्यादाओं को अधिकाधिक रौंदती चलती है। जैसे कुछ समाजों में स्त्री को शिक्षा से वंचित कर पर्दे में बंद रखने पर बाद में स्त्रियां उसे एक नियति मानकर उसी तरह रहने की आदी हो जाती हैं और वही नियति उन्हें पुरुषों की स्वच्छंदता के बराबर लगने लगती है, ठीक उसी तरह, देशवासियों को भी वोटतंत्र अनिवार्य-सा लगने लगा है, यह जानते हुए भी कि यह उनके भविष्य का हरण कर रहा है। बुद्धिजीवियों से लेकर राजनीतिज्ञों तक और विशिष्टों से लेकर सामान्य जन तक, सबके सब एक तरह की 'वोटांधता' के शिकार हो गए लगते हैं। परिवर्तन सृष्टि का नियम है। ब्रह्मांड में प्रत्येक वस्तुस्थिति परिवर्तन के अधीन है। जो सभ्यताएं यथास्थितिवाद की शिकार बनी रहीं, पृथ्वी से उनके पदचिह्न तक मिट गए। सनातन संस्कृति शताब्दियों से पुष्पित-पल्लवित है, क्योंकि हमारे पूर्वज सृष्टि के लयबद्ध विकास की तरह स्वयं को समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप ढालते रहते थे और ज्ञान के उत्तरोत्तर विकास के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनीतिक विकास को नवीन आयाम देते रहते थे।


मगर इधर हमारे जंग खा चुके वोटतंत्र की नींव पर लड़खड़ाती लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जो यथास्थितिवाद के खूंटे पर बंधी देश-समाज-संस्कृति को अप्रासंगिकता के अंधकार की ओर धकिया रही है। विगत दशक में मैंने भूटान में अपने व्याख्यान में मानव प्रसन्नता के सात सिद्धांतों में लोकतंत्र को भी सम्मिलित किया था। गौरतलब है कि भूटान ही दुनिया में इकलौता ऐसा देश है, जो सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) के स्थान पर सकल राष्ट्रीय प्रफुल्लता (जीएनएच) को राष्ट्रीय उत्थान का संकेतक मानता है। भूटान में लोकतंत्र नहीं है, वह उन चंद देशों में से एक है, जहां अब भी राजतंत्र है। यह वह राजतंत्र है, जो अपनी जनता की प्रसन्नता को अपना सबसे बड़ा यश मानता है।


लेकिन पिछले कुछ चुनावी दौर में और वर्तमान में चल रहे चुनावी दौर में भी ईर्ष्या, द्वेष-वैमनस्य की लहर से मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि लोकतंत्र जनता की प्रसन्नता की तो छोड़ें, देश की अखंडता को भी चिढ़ा रहा है, और यह राष्ट्रीय प्रसन्नता का स्रोत तो बिल्कुल नहीं रहा। इस लोकतंत्र में प्रासंगिक भारत तो बहुत पीछे छूटा जा रहा है। अब्राहम लिंकन यदि आज जीवित होते, तो 'लोगों द्वारा, लोगों के लिए, लोगों की सरकार' वाली अपनी परिभाषा पर शर्मिंदा हो रहे होते। लोकतंत्र नाम दें या कुछ और, अब राजकीय व्यवस्था सृजन की वैकल्पिक रणनीति विकसित करने का समय आ गया है। देश के भविष्य को सुरक्षित और अक्षुण्ण रखना, उसे उत्तरोत्तर मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत रखना एवं प्रासंगिक भारत का पुनर्निर्माण करना वर्तमान राजकीय व्यवस्था का धर्म है।
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-पूर्व प्रोफेसर, जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय

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