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अनंग से लड़ने की शक्ति

Mon, 15 Oct 2012 10:15 PM IST
हेमंत शर्मा
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दशहरा ‘शक्ति’ को साधने का उत्सव है। हम सबकी ऊर्जा की इकलौती स्रोत है शक्ति। इसलिए हर किसी को शक्ति चाहिए। मनमोहन सिंह को आर्थिक सुधार लागू करने के लिए शक्ति चाहिए। नरेंद्र मोदी को गुजरात में कांग्रेस को हराने के लिए शक्ति चाहिए। विपक्ष को सरकार गिराने के लिए शक्ति चाहिए। रॉबर्ट वाड्रा को अरविंद केजरीवाल से निपटने के लिए शक्ति चाहिए। रोजी और रोटी की लड़ाई में आमजन को शक्ति चाहिए। यानि सबकी व्याकुलता शक्ति के लिए है।
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दरअसल धारणा यह है कि गऊपट्टी में रहने वालों के पास अध्यात्म तो है, पर शक्ति नहीं है। इसलिए शक्ति पाने के लिए हमारे पुरखों ने साल में दो बार नवरात्र पूजा का विधान किया, जीवन और समाज की रक्षा के लिए। इन नवरात्रों में आमजन शक्ति के उत्सव में इस कदर विलीन होता है कि स्पर्श, गंध और स्वर सब में शक्ति को महसूस करने लगता है। दुर्गापूजा का प्राण तत्व उसका यही लोकतत्व है।

जब भगवान राम का आत्मविश्वास भी रावण के सामने डिगने लगा, तब उन्होंने ‘शक्ति पूजा’ का सहारा लिया। राम की आस्था को देखते हुए शक्ति ने उन्हें भरोसा दिया, होगी जय होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन। तब रावण का अंत हुआ। शक्ति असुर भाव को नष्ट करती है। चाहे वह भीतर हो या बाहर। नवरात्र में शक्तिपूजा का अर्थ भी यही है, अपनी समस्त ऊर्जा का समर्पण। और सबकी ऊर्जा का स्रोत एक शक्ति को मानना।
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बचपन से हमें यह घुट्टी पिलाई गई थी कि जब-जब आसुरी शक्तियों के अत्याचार या प्राकृतिक आपदाओं से जीवन तबाह होता है, तब-तब शक्ति का अवतरण होता है। पर आज की पीढ़ी के लिए शक्ति पूजा गरबा, डांडिया, जात्रा के अलावा और क्या है? पूजा के नाम पर जबरन चंदा वसूली का नया सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद उदित हो रहा है। जिसमें साधना गायब है। दुर्गापूजा की मौजूदा परंपरा चार सौ साल पुरानी है। बंगाल के तारिकपुर से शुरू हुई यह परंपरा जब बाहर निकली, तो बनारस पहुंची। दिल्ली में तो 1911 के बाद दुर्गापूजा का आगमन हुआ। बाद में आजादी की लड़ाई में पूजा पंडाल राजनीतिक गतिविधियों के मंच बने।
 
दुर्गापूजा सिर्फ मिथकीय नहीं, यह स्त्री के सम्मान, ताकत, सामर्थ्य और उसके स्वाभिमान की सार्वजनिक पूजा है। जिस समाज में स्त्री का स्थान सम्मान और गौरव का होता है, वही समाज सांस्कृतिक लिहाज से समृद्ध होता है। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रखरता को देखते हुए अटल बिहारी वाजपेयी को भी उन्हें दूसरी दुर्गा कहना पड़ा था। गुरु गोविंद सिंह ने भी युद्ध से पहले शक्ति की आराधना की थी। सिखों की अरदास, शक्ति पूजा से ही शुरू होती है। प्रिथम भगौती सिमरि कै गुरुनानक लई धिआई। (अर्थात मैं उस मां भगवती को सिमरण करता हूं, जो नानक गुरु के ध्यान में आई थीं) गुरु गोविंद सिंह चंडी को आदिशक्ति मानते थे। दुर्गापूजा की ऐतिहासिकता बंगाल से जुड़ी है।

इसका ठीक वैसा ही महत्व है, जैसे महाराष्ट्र में नवजागरण में तिलक की गणपति पूजा का या फिर उत्तर भारत में डॉ लोहिया के रामायण मेले का। तीनों ने समाज में एक-सी जागरूकता पैदा की। तीनों पूजाओं का चलन आधुनिकता में परंपरा का बेहतर प्रयोग था। वैदिक वांग्मय में शक्ति के कई नाम हैं। वाग्देवी, पृथ्वी, अदिति, सरस्वती, इड़ा, जलदेवी, रात्रिदेवी, अरण्यानी, उषा जैसे नाम मिलते हैं। इसके अलावा जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा, स्वधा आदि देवियां भी मिलती हैं। नवरात्र, यानी नौ पावन, दिव्य, दुर्लभ शुभ रातें।

 वासंतिक और शारदीय नवरात्र जन सामान्य के लिए है, और आषाढ़ीय तथा माघीय नवरात्र गुप्त नवरात्र होने के कारण सिर्फ साधकों के लिए है। मेरे बचपन में दुर्गापूजा और दशहरे का मतलब था, शिखा में नवांकुर (अन्न के) बांधना, नीलकंठ देखना और रावण जलाना। हमारी शिखा नहीं थी, तो कान पर रखा जाता था। नीलकंठ अब दिखते नहीं। शिखा सबकी लुप्त है। और रावण बार-बार जलने के बाद फिर पैदा हो जाता है। वह अनंग है। अंग रहित। इस अनंग से लड़ने की शक्ति हमें मिले। यही शक्ति साधना के मायने हैं।
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