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उत्सवों की शृंखला का प्रस्थान बिंदु

Mon, 15 Oct 2012 10:03 PM IST
परिचय दास
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जयप्रकाश नारायण ने अपने पूरे जीवन को आत्मशोधन बताया था। उनकी जेल में लिखी एक कविता है, जिसमें यह प्रसंग आता है कि वह जीवन भर अपनी परिशुद्धि करते रहे थे। समाज शुद्धि और स्वयं का परिमार्जन, दोनों साथ-साथ चलना चाहिए। विजयदेव नारायण शाही ने अपने एक निबंध में लिखा था कि वह इस बात से सहमत नहीं हैं कि केवल वर्ग संघर्ष से समता आ जाएगी। वह आत्मसंघर्ष को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे।
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नवरात्र को समकालीन परिप्रेक्ष्य में अंतःपरिमार्जन का स्वरूप या साधन मानना चाहिए। जीवन एकरेखीय नहीं होता। उससे अनेक ध्वनियां आती हैं। वहां संश्लेषण है, तो विरेचन भी। नौ दिन अंतःप्रक्षालन के दिन हैं। अंतःविवेक, अंतःजागृति। फिर से भविष्य का निर्माण। फिर से यह संकल्प कि असहाय पर अनुचित शक्तियों के आरोपण का निक्षेप करना है। सकारात्मक शक्तियों के संपुंजन के साथ संसार को आलोकित करना है। वह शक्ति किस काम की, जो विपन्न के पक्ष में न खड़ी हो। वह ताकत क्या अर्थ रखती है, जो अन्याय का प्रतिरोध न करे।

वह युवावस्था, जो हमारे समय के 'महिषासुर' प्रवृत्तियों को विनष्ट न करे। जो लरै दीन के हेत सूरा सोई। जो बस अपने लिए जीता या खाता है, वह विशिष्ट अर्थों में मनुष्यता का बोधक नहीं कहा जा सकता। शक्ति के साथ सकारात्मक होते हुए क्षमाशील होना मनुष्य की संपूर्णता की अनुरक्ति का अंतहीन महाकाव्य है। अंतःमन और व्यवस्था की आसुरी नकारात्मकताएं हमें दुख-दैन्य के सांकल में बांधे रखती हैं। उनको तोड़ देना वास्तविक नवरात्र है।
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शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक नौ तिथि, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जाता रहा है। दस महाविद्याओं की हेतु हैं-काली, त्रिपूर भैरवी, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, तारा व कमला। तीन देवियां-महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती तथा नवदुर्गा के स्वरूपों की उपासना होती है-शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धदात्री।

आश्विन मास का शारदीय नवरात्र हो या चैत्र मास का, दोनों ही मौसम की अनुकूलता के कारण मंगलकारी हैं। न अधिक गरमी और न अधिक सर्दी। शायद इसका विधान ही इस समय व ऋतुबोध के कारण हुआ होगा। उत्सवों की शृंखला शारदीय नवरात्र से ही शुरू होती है। प्राकृतिक सौंदर्य और खान-पान सबमें उत्सव ही उत्सव। जहां मन-हृदय पवित्र हो, वहीं उत्सव होता है।
असल में उत्सव शक्ति का नहीं होता, उत्सव जीत का नहीं होता, उत्सव शक्ति को हताशा से हटाकर सही जगह लगाने के संकल्प का होता है। उत्सव संघर्ष-यात्रा पर निष्ठापूर्वक चलते रहने, अविचलित रहने का होता है।

नवरात्र वैसे तो वैयक्तिक रूप से मनाया जाता रहा है, लेकिन 'दुर्गापूजा' व 'गरबा' के रूप में इसका सामाजिक रूप भी देखने को मिलता है। बंगाल में बांग्ला संस्कृति व गुजरात में गुजराती संस्कृति का सबसे रंगमय रूप इसी समय देखने को मिलता है। ये रूप अब समस्त भारत व विश्व में देखे जाने लगे हैं। जैसे गणेश पूजा महाराष्ट्र में, छठ पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में सामाजिक सांस्कृतिकता के हेतु हैं, वैसे ही दूर्गापूजा बंगाल व गरबा गुजरात में। इस अवसर पर नृत्य-संगीत, लोकरंग के इतने स्वरूप देखने को मिलते हैं कि छटा छा जाती है। लोगों से मिलना-जुलना होता है। सबसे निकटता बढ़ती है।

पुरानी त्रुटियों के लिए क्षमा, नए जीवन का आरंभ। हर बार। इस समय का संगीत पूरे वर्ष आह्लादित करता रहता है। इस समय की मूर्तियों व पंडालों की छवियां साल भर गति देती रहती हैं। इस समय साथ में खेले गए नाटक, किए गए नृत्य तन-मन, दोनों को स्वस्थ-प्रसन्न रखते हैं। अनुष्ठान केवल व्रत, उपवास, हवन, संयमन से ही नहीं, हमारे संबंधों की नई जिजीविषा से होता है, नई रसमयता लाने के हेतु। अपने अंदर उतरकर फिर से ऊर्जा प्राप्त करने का उत्सव। यदि पीछे की विफलताएं छोड़ दी जाएं, उनसे पाठ लिया जाए, तो आगे उत्सव ही उत्सव है। आशाओं की नई फसल खिलाने का उत्सव।

नवरात्र का उत्सव नृत्य के साथ प्रेम करना सिखाता है, स्वप्न देखना सिखाता है। स्वप्न देखें-नए दिनों के, नए समाज के, जहां अन्याय न हो। असुर रहित समाज। स्नेह के बंधन में बंधा समाज, आत्मीयता के पाश में आबद्ध मनुष्य। मनुष्य है इतिहास का नायक। देवी तो संसिद्धि देती है। हेतु मनुष्य ही है। मनुष्य के दुख का इतिहास जैसे असीम है, वैसे ही उसके संघर्ष का इतिहास भी। नौ दिनों के बाद विजयादशमी। विजय से अधिक है संघर्ष।

नवरात्र उसी अंतःसंघर्ष व बाह्य-संघर्ष की गाथा है-महागाथा। रूस के प्रसिद्ध बिंबवादी कवि आनेनस्की की कविता का अंश-सुनहला उपवन भर रहा है/ धीरे-धीरे फैल रही है मटियाली छांह/ सूरज के पसरे उत्ताप में/ पकी वेदना के लिए तैयार हैं सब/ मगर यह हृदय?/ वही तो शोक व विछोह का सौंदर्य/ समझ पाता है/ मंत्रमुग्ध शक्ति का लोभ/ कर पाता है अनुभव/ जो ले पाता है कमल की महक/ वही केवल शरत् के वशीकरण में/ सौरभ में हो पाता बेचैन। जब तक आकाश में सिंदूरी रंग होगा, जब तक पेड़ों पर चिड़ियों की चहकन होगी, जब तक फूल पत्तियां सुगंध देती रहेंगी, तब तक मनुष्य की प्रत्याशाएं रहेंगी, तब तक उसके अंदर नवरात्र रहेगा। सौंदर्य वलयित, शक्ति संपूजित।
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