बाढ़ से एक दिन पहले तक आप एनएच-वन पर जम्मू से श्रीनगर जाने के रास्ते जैसे ही जवाहर टनल पार करते, आपको जगह-जगह सीआरपीएफ के जवान पहरा देते मिल जाया करते थे। अकेले खड़े इन जवानों पर हमले की आशंका हर वक्त मंडराया करती थी कि कब कोई सिरफिरा इन पर पत्थर फेंक दे या गोली चला दे। हर आठ-दस किलोमीटर पर राष्ट्रीय राइफल्स के मुस्तैद जवान भी दिख जाते। हर रेजीमेंट के जवान को कुछ दिन राष्ट्रीय राइफल्स में जरूर रहना पड़ता है, और अगर मामला कश्मीर का हो, तो यह ड्यूटी किसी जंग से कम नहीं। शिरस्त्राण यानी लोहे की टोपी, सीने पर लोहे का कवच, कंधे पर राइफल या एके-47 और कमर में बंधी कारतूसों की लड़ी। इसके अलावा खाना-पानी अलग से।
सेना तब भी स्थानीय अमनपसंद नागरिकों के लिए सद्भावना स्कूल चलाती और उनसे खूब मिलने-जुलने की कोशिश करती, पर आम तौर पर वह अपने इस मिशन में नाकाम ही रहती। स्थानीय लोग सेना से एक दूरी बरतते और मौका मिलते ही उसके प्रति अपनी नफरत को जाहिर कर ही देते। सीआरपीएफ के जवानों पर पत्थर फेंकना आम बात थी।
पर एक प्राकृतिक विपदा ने सेना और आम नागरिकों को पास ला दिया है। आज कश्मीर घाटी का हर आदमी जानता है कि अगर सेना नहीं होती, तो बाढ़ की विनाश लीला से बचना मुश्किल था। ज्यादा खराब स्थिति तो लाल चौक की थी, जहां सेना का जाना एक हादसा माना जाता था और किसी भी क्षण वहां गोला-बारूद गूंजने लगते। उसी लाल चौक में सेना ने बगैर भेदभाव के सबको निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। आज कश्मीर में सेना एक त्राता की शक्ल में उभरी है।
सेना के दो चेहरे होते हैं। एक, जब वह सीमा पर दुश्मनों के साथ युद्धरत होती है अथवा देश के अंदर कुछ अशांत इलाकों में शांति बहाली हेतु तैनात की जाती है, दूसरे-जब वह देश में आई किसी प्राकृतिक विपदा के समय तैनात होती है। तब सेना का एक मानवीय चेहरा सामने आता है और वह धर्म तथा वर्ग व वर्ण से ऊपर उठकर राहत कार्य में जुट जाती है। चाहे वह पिछले साल का केदारनाथ हादसा रहा हो अथवा हाल की जम्मू-कश्मीर की आपदा। दोनों ही जगह सेना ने अपने धैर्य और अपनी कारुणिक छवि का इजहार किया है। इससे सेना का वह दूसरा चेहरा भी सामने आया, जो अब केंद्र सरकार के प्रतिनिधि का नहीं है। वरना पुलवामा, सोफियान समेत पूरी कश्मीर घाटी के लोग सेना की तैनाती को केंद्र की राजनीतिक चाल मानते हैं।
पिछले महीने अमरनाथ यात्रा के समय हमें जम्मू से आगे वाया श्रीनगर और बालटाल ले जाने वाला ड्राइवर सोफियान के बलपुरा गांव का ही रहने वाला था। उसी ने हमें बताया था कि सेना से हम लोग दूरी बरतते हैं और सीआरपीएफ जवानों से चिढ़ते हैं। उसने यह भी बताया था कि हमें आजाद कश्मीर चाहिए।
मगर अब हालात बदल गए हैं तथा सेना और अर्द्धसैनिक बल के बारे में स्थानीय नागरिकों की राय बदली है। भले ही कश्मीर के अलगाववादी गुट वायुसेना के जवानों पर पथराव करें, पर उन्हें पता है कि जनता अब उन्हें पनाह नहीं देने वाली। पुलवामा के एक शिक्षक मोहम्मद बिलाल ने फोन पर मुझे बताया कि सेना का जो चेहरा हम पिछले 20 साल में नहीं देख पाए, वह बाढ़ में देख लिया।