फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अवसरों का लाभ उठाए भारत

Mon, 15 Sep 2014 07:00 PM IST
एम के वेणु
विज्ञापन
विज्ञापन
जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ घनिष्ठ रिश्ते का प्रदर्शन करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब 17 सितंबर को अहमदाबाद में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का स्वागत कर एक दूसरी सनसनी पैदा करने के लिए तैयार हैं। यह महज संयोग ही है कि जिनपिंग का आगमन उस दिन हो रहा है, जब प्रधानमंत्री अपना 64वां जन्मदिन मना रहे होंगे; हालांकि जम्मू-कश्मीर की आपदा के कारण इस बार उन्होंने जन्मदिन मनाने से साफ इन्कार कर दिया है। प्रधानमंत्री अपने गृह राज्य गुजरात में चीनी नेता का गर्मजोशी के साथ स्वागत करने के इच्छुक हैं। ऐसा कर वह दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि चीनी नेता के साथ उनके संबंध उतने ही विशिष्ट होंगे, जितने किसी भी अन्य शक्तिशाली देश के नेता के साथ होने चाहिए।
विज्ञापन


यह प्रतिस्पर्धी कूटनीति का बेहतरीन उदाहरण है। मोदी उस शी जिनपिंग के लिए लाल कालीन बिछाएंगे, जो आर्थिक और सैन्य मामले में दुनिया के दूसरे सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति हैं। शी जिनपिंग से मोदी ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान जुलाई में अलग से मिले थे और लगता है कि दोनों के बीच वहां अच्छे माहौल में बातचीत हुई थी। हाल ही में शी जिनपिंग ने यह टिप्पणी की थी कि जब वह मोदी से पहली बार मिले, तो उन्हें लगा कि वह उन्हें लंबे समय से जानते हैं। इससे पता चलता है कि दोनों नेताओं ने बहुत कम समय में एक बेहतर और मजबूत रिश्ता कायम किया है।

मोदी का शी जिनपिंग को गुजरात में बुलाने का एक दूसरा अनकहा प्रतीकात्मक अर्थ हो सकता है। चीन की राजनीति में कोई भी नेता प्रांत में अपनी क्षमताएं साबित करने के बाद ही शीर्ष पर पहुंच पाता है। दरअसल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में वरिष्ठता क्रम इतना व्यवस्थित है कि उसी नेता को राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष पर पहुंचने का मौका मिलता है, जिसने प्रांतों में बेहतर विकास मॉडल को विकसित करने में सफलता पाई हो।
विज्ञापन


इसके अलावा, मोदी और जिनपिंग में अन्य समानताएं भी ढूंढी जा सकती हैं। मसलन, राष्ट्रपति बनने के बाद शी जिनपिंग ने सफलतापूर्वक शासन की सभी शक्तियों- राजनीतिक, सैन्य एवं आर्थिक, को अपने कार्यालय में केंद्रीकृत कर लिया। उनसे पहले चीन के किसी राष्ट्रपति का वहां की प्रभुत्वशाली सेना पर सीधा नियंत्रण नहीं था। चीन की आर्थिक नीतियां तैयार करने वाली संस्था नेशनल डेवलपमेंट ऐंड रिफॉर्म कमीशन (राष्ट्रीय विकास एवं सुधार आयोग-एनडीआरसी) ज्यादातर चीन के प्रधानमंत्री कार्यालय से ही नियंत्रित होता था। लेकिन अब सेना और एनडीआरसी, दोनों सीधे राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नियंत्रण में हैं।

जिनपिंग की तरह मोदी ने भी रक्षा एवं आर्थिक नीति-निर्माण के प्रमुख क्षेत्रों के अधिकारों को प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रित कर लिया है। शी जिनपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान भी चलाया है, हालांकि वह खुद उसी व्यवस्था से उभरे हैं। मोदी ने भी अपनी पार्टी और अन्य दलों के भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों के खिलाफ चल रहे मुकदमों के समयबद्ध निपटारे की अपील की है। उन्होंने न्यायपालिका से ऐसे मामलों को तेजी से निपटाने का आग्रह किया है, हालांकि उनकी अपनी पार्टी के ही कई महत्वपूर्ण नेताओं के खिलाफ अदालतों में कई आपराधिक मामले चल रहे हैं।

शी जिनपिंग ने सत्ता संभालते ही तत्काल दो शक्तिशाली राष्ट्रों-अमेरिका और चीन के बीच संवाद का आह्वान किया था। ऐसा करते हुए उन्होंने अपने नेतृत्व को एक नए स्तर पर खड़ा किया। मोदी ने भी खुद को एशियाई नेता के रूप में खड़ा करने में समय नहीं गंवाया, जिसकी झलक शपथ ग्रहण में ही दिख गई थी, जहां दक्षिण एशियाई देशों के प्रमुख मौजूद थे। हालांकि विदेश नीति के क्षेत्र में अभी उनके शुरुआती दिन ही हैं। बावजूद इसके इन दोनों नेताओं की सोच में और भी दिलचस्प समानताएं हैं।

चीन का बहुत बारीकी से अध्ययन करने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने इस लेखक को बताया कि मोदी और शी जिनपिंग क्रमशः नेहरू और माओ, (जिन्हें दोनों राष्ट्रों को आधुनिक बनाने का श्रेय दिया जाता है) की ऐतिहासिक विरासत को ढोने के पक्ष में नहीं हैं। मोदी के करीबी माने जाने वाले उस भाजपा नेता ने बताया कि दोनों नेता दोनों देशों के बीच दशकों से जारी सीमा विवाद के हल के लिए एक अलग तरह के समाधान के साथ सामने आ सकते हैं।

मोदी जानते हैं कि चीन के साथ स्थायी शांति बहाल करने पर इतिहास में उन्हें महत्वपूर्ण जगह मिल सकती है। ब्राजील में शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद मोदी ने एक दिलचस्प टिप्पणी की थी। उन्होंने सुझाया था कि भारत और चीन संभवतः दुनिया को यह दिखा सकते हैं कि अलग सोच के साथ कैसे ऐतिहासिक रूप से जटिल समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। अपने जन्मदिन पर शी जिनपिंग को अहमदाबाद बुलाकर मोदी निकट भविष्य में ऐसी ही किसी महत्वपूर्ण योजना की नींव रख सकते हैं।

मोदी यह भी मानते हैं कि इस समय उन्हें भारी राजनीतिक समर्थन हासिल है, जो उन्हें चीन के साथ रचनात्मक संबंध बढ़ाने की छूट देता है। चीन का राजनीतिक नेतृत्व भी भारत के साथ बेहतर संबंध बनाना चाहता है, खासकर भारत और जापान के बीच हुए व्यापार वार्ता को देखने के बाद। मुंबई में चीन के महावाणिज्यदूत की टिप्पणी थी कि चीन अगले पांच वर्षों में भारत में सौ अरब डॉलर निवेश करने की प्रतिबद्धता जता सकता है, जो जापान द्वारा प्रस्तावित 35 अरब डॉलर से बहुत ज्यादा है। नरेंद्र मोदी इस अर्थ में बहुत सौभाग्यशाली हैं कि वह एक ही समय में अमेरिका, चीन और जापान का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल हुए हैं। इसलिए इस मौके का उन्हें फायदा उठाना चाहिए।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें