संघर्ष में शामिल अलग-अलग पक्षों के साथ यदि ब्राजील बात कर रहा है, तो उसकी एक वजह है। दरअसल, उसने युद्ध में किसी का भी पक्ष न लेने का निश्चय किया है। ऐसा करते हुए वह उस सिद्धांत का पालन करता दिख रहा है, जिसे मेरे सहयोगियों और मैंने 'सक्रिय गुटनिरपेक्षता' कहा है। 'सक्रिय गुटनिरपेक्षता' से हमारा अभिप्राय वैसी विदेश नीति से है, जिसमें विकासशील दुनिया के देश-अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका बड़ी शक्तियों के बीच हो रहे संघर्ष में किसी का भी पक्ष लेने से इन्कार करते हैं और केवल अपने हितों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
इस नई 'गुटनिरपेक्षता' और पिछले दशकों में राष्ट्रों द्वारा अपनाई जा रही गुटनिरपेक्षता में फर्क यह है कि नई गुटनिरपेक्षता की बात आज ऐसे समय में हो रही है, जब विकासशील देश पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत होकर उभर रहे हैं। अब ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) को ही लें, क्रय शक्ति के मामले में इनका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आर्थिक दृष्टि से उन्नत राष्ट्रों के जी-7 समूह से आगे निकल गया है। यह बढ़ती हुई आर्थिक शक्ति सक्रिय गुटनिरपेक्ष देशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सशक्त बनाती है, जिससे उनके लिए नई पहल करना और कूटनीतिक गठजोड़ करना सहज हो जाता है, जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
सक्रिय गुटनिरपेक्षता को बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा से बढ़ावा मिला है, जिसे मैं अमेरिका और चीन के बीच उभरते द्वितीय शीतयुद्ध के रूप में देखता हूं। विकासशील दुनिया के कई देशों के लिए वाशिंगटन और बीजिंग, दोनों के साथ अपने आर्थिक विकास, व्यापार एवं निवेश के लिए अच्छे संबंध बनाए रखना महत्वपूर्ण रहा है। इस बढ़ते संघर्ष में किसी एक का पक्ष लेना उनके हित में नहीं है। ऐसी गुटनिरपेक्षता के लिए एक अत्यधिक परिष्कृत कूटनीति की जरूरत होती है, जो प्रत्येक मुद्दे को उसकी खूबियों के आधार पर परखती और दक्षता से फैसले लेती है।
जहां तक यूक्रेन युद्ध का संबंध है, सक्रिय गुटनिरपेक्षता का मतलब रूस या नाटो में से किसी का भी समर्थन नहीं करना है। विकासशील दुनिया में ऐसी नीति अपनाने वाला ब्राजील अकेला देश नहीं है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई प्रमुख देशों ने नाटो का पक्ष लेने से इन्कार कर दिया है। इनमें सबसे प्रमुख भारत रहा है। अमेरिका से बेहतर रिश्ते और क्वाड में शामिल होने के बावजूद भारत ने यूक्रेन पर रूसी हमले की निंदा करने से इन्कार कर दिया और रूस से तेल आयात में काफी बढ़ोतरी भी की है। वास्तव में भारत की स्थिति दर्शाती है कि विश्व वास्तव में विकसित और विकासशील देशों के बीच बंटा है।
भारत के अलावा दुनिया के कुछ बड़ी आबादी वाले लोकतंत्रों ने नाटो का पक्ष लेने से इन्कार कर दिया है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के लगभग किसी भी देश ने रूस के खिलाफ कूटनीतिक और आर्थिक प्रतिबंधों का समर्थन नहीं किया है। हालांकि इनमें से कई देशों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में यूक्रेन पर रूसी हमले की निंदा करने के लिए मतदान किया है। 140 से अधिक सदस्य देशों ने बार-बार ऐसा किया है, क्योंकि कोई भी देश एक यूरोपीय युद्ध को वैश्विक युद्ध नहीं बनाना चाहता है। वाशिंगटन इस प्रतिक्रिया से हैरान है। उसने यूक्रेन युद्ध को अच्छे और बुरे के बीच एक विकल्प के रूप में चित्रित किया है, जहां 'नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था' का भविष्य दांव पर है। रूस ने नए गुटनिरपेक्ष आंदोलन को अपनी स्थिति मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा। जबकि चीन ने युआन की अंतरराष्ट्रीय भूमिका बढ़ाने के लिए अभियान तेज कर दिया है।
मेरा मानना है कि सक्रिय गुटनिरपेक्षता क्षेत्रीय बहुपक्षवाद और सहयोग पर उतना ही निर्भर करती है, जितना इन उच्च स्तरीय बैठकों पर। हाल ही में लूला द्वारा ब्रासीलिया में आयोजित दक्षिण अमेरिकी राजनयिक शिखर सम्मेलन ने अंतरराष्ट्रीय पहलों को लागू करने के लिए पड़ोसियों के साथ मिलकर काम करने की जरूरत के बारे में ब्राजील की जागरूकता को दर्शाया है। मिलकर काम करने की जरूरत क्षेत्र के आर्थिक संकट से भी प्रेरित है। वर्ष 2020 में, लैटिन अमेरिका 120 वर्षों में सबसे खराब आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया था। इस क्षेत्र को कोविड-19 के चलते दुनिया में सर्वाधिक मौतों का सामना करना पड़ा। ऐसे में, बड़ी शक्तियों की लड़ाई में न फंसने की सोच के तहत सक्रिय गुटनिरपेक्षता का उभार हुआ है।
शुरुआती अमेरिकी-चीन शीतयुद्ध और यूक्रेन युद्ध के अलावा, अपने नए 'सक्रिय' अवतार में गुटनिरपेक्षता का पुनरुत्थान द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से अस्तित्व में आए 'उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था' के प्रति विकासशील देशों के व्यापक मोहभंग को दर्शाता है। इस व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय ऋणग्रस्तता और खाद्य सुरक्षा से लेकर प्रवासन एवं जलवायु परिवर्तन तक के मुद्दों पर विकासशील देशों की जरूरतों के प्रति बेहद गैर-जवाबदेह माना जाता है। विकासशील दुनिया के कई देशों को 'नियम-आधारित व्यवस्था' बनाए रखना वैश्विक जनकल्याण के बजाय केवल महान शक्तियों की विदेश नीति के हितों की पूर्ति करना लगता है। ऐसे में, हैरत नहीं कि इतने सारे देश सक्रिय रूप से 'हम बनाम वे' की स्थिति में फंसने से इन्कार कर रहे हैं।
-लेखक बोस्टन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ हैं।
(द कन्वर्सेशन से साभार)