इस वर्ष के अंत तक देश के चार बड़े राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व तेलंगाना में चुनाव होने हैं। ये चारों राज्य भौगोलिक व सामरिक संरचना के हिसाब से जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण इनका देश के आर्थिक विकास में योगदान भी है। फिर भी आर्थिक विकास के विभिन्न मापदंडों के हिसाब से इन सभी राज्यों को एक ही तराजू में तौलकर नहीं देखा जा सकता है। मसलन, यदि राज्यों के वित्तीय घाटे की बात करें, तो चालू वित्तीय वर्ष के लिए निर्धारित की गई तीन प्रतिशत की सीमा से राजस्थान तथा मध्य प्रदेश बहुत आगे दिखते हैं, क्योंकि दोनों में वित्तीय घाटा चार फीसदी अनुमानित है। वहीं छत्तीसगढ़ में तीन फीसदी तथा तेलंगाना में 2.7 फीसदी अनुमानित है, जो कि बेहतरीन आर्थिक स्थिति का प्रतीक है।
गौरतलब है कि वित्तीय घाटा आर्थिक स्थिति का एक ऐसा सार होता है, जिसके विश्लेषण से कई पक्ष उभर कर सामने आते हैं। अब भले राजस्थान व मध्य प्रदेश का वित्तीय घाटा तकरीबन एक जैसा है, पर तुलनात्मक रूप से मध्य प्रदेश राजस्थान से बेहतर स्थिति में है। उसी तरह चाहे तेलंगाना का वित्तीय घाटा चारों राज्यों में तुलनात्मक रूप से सबसे कम है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह सबसे अच्छी आर्थिक स्थिति में है।
किसी भी राज्य के आर्थिक विकास की आदर्श स्थिति के अंतर्गत तीन बातें मुख्य रूप से ली जा सकती हैं। एक, पूंजीगत खर्चों का राज्य के कुल खर्चों में अनुपात। दूसरा, बजटे में पूंजीगत खर्चों का वास्तविक क्रियान्वयन और तीसरा, राजस्व खर्चों में प्रतिबद्ध व्ययों का अनुपात। इन पक्षों के आधार पर राजस्थान व मध्य प्रदेश का वित्तीय घाटा एक समान होने के बावजूद अंतर इस बात का है कि मध्य प्रदेश में पूंजीगत खर्च बढ़ाने के मकसद से लिए गए वित्तीय कर्ज पर दिए जाने वाला ब्याज एक मुख्य कारण है। वहीं राजस्थान में प्रतिबद्ध व्ययों का प्रतिशत तुलनात्मक रूप से राजस्व खर्चों में बहुत अधिक है। आंकड़ों के अनुसार, पूंजीगत खर्चों पर होने वाले व्यय राजस्थान में मात्र आठ फीसदी ही है, इस कारण यह चारों राज्यों में सबसे निचले पायदान पर है। गौरतलब है कि पूंजीगत खर्च बढ़ाना यदि एक राज्य सरकार अपना लक्ष्य रखती है, तो निश्चित रूप से आर्थिक समृद्धि आर्थिक नीतियों में झलकती है, क्योंकि इन खर्चों के जरिये नए रोजगारों का सृजन होता है, महंगाई पर नियंत्रण लगता है तथा मूलभूत सुविधाओं का विकास होता है, जो नए उद्योग-धंधों तथा निजी निवेश को बेहतर तरीके से आकर्षित करता है। इन खर्चों के माध्यम से राज्य को विभिन्न प्रकार के नए आय के स्रोत पैदा करने में मदद भी मिलती है, जिसके जरिये भविष्य में उत्पादकता तथा कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।
पूंजीगत खर्चों के प्रति आर्थिक नीतियों में फोकस किसी भी राज्य को आर्थिक समृद्धि की ओर ले जा सकता है। इसलिए पूंजीगत खर्चों का अनुपात लगातार बढ़ना तथा बजट में खर्चों के 90 फीसदी के आसपास वास्तविक रूप में क्रियान्वित होना अत्यंत आवश्यक है। वहीं दूसरी तरफ राजस्व खर्चों में वेतन तथा पेंशन का बहुत अधिक योगदान निश्चित रूप से राजस्व घाटे को बढ़ाएगा, इसलिए इसे 50 फीसदी से नीचे रखना बहुत जरूरी है। अन्यथा राज्य कभी समृद्ध नहीं हो पाएगा और अपनी सामाजिक कल्याण की सोच के प्रति भी कार्य नहीं कर पाएगा, जिसका नतीजा अंततः एक गरीब और पिछड़े राज्य के रूप में देखने को मिलेगा।