विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ने तालिबान के साथ आधिकारिक राजनयिक रिश्ता न रखने संबंधी वैश्विक राय ठुकरा दी है, जबकि पूर्णकालिक राजदूत की तैनाती परोक्ष रूप से उसे मान्यता देने के बराबर है। इस तरह का कदम पाकिस्तान ने भी नहीं उठाया है, जो काबुल शासन के ‘उद्धारकर्ता’ होने का दावा करता है।
चीन तालिबान के प्रति नरम नीति अपना रहा है, जिसका उद्देश्य अफगानिस्तान के विशाल खनिज संपदा का दोहन करने के लिए नए शासन को अपने कर्ज के जाल में फंसाना है। चीन की कंपनी गोचिन ने विगत अप्रैल में अफगानिस्तान के लिथियम भंडार में 10 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश करने की इच्छा व्यक्त की थी, जिसकी पुष्टि तालिबान के खान और पेट्रोलियम मंत्रालय ने की थी। चीनी कंपनी ने तालिबान शासन को आश्वासन दिया है कि वह इस देश में परोक्ष रूप से 10 लाख और प्रत्यक्ष रूप से 1,20,000 नौकरियां पैदा करेगी। इसी तरह झिंजियांग सेंट्रल एशिया पेट्रोलियम ऐंड गैस कंपनी (सीएपीईआईसी) ने विगत जनवरी में उत्तरी अफगानिस्तान के अमु दरिया बेसिन से तेल निकालने के लिए 54 करोड़ डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो लगभग दस खरब डॉलर मूल्य की विशाल खनिज संपदा के दोहन की भावी योजना का हिस्सा है। पेंटागन, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सेवा और यूनाइटेड स्टेट एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) की संयुक्त टीम की गणना के अनुसार, अफगानिस्तान के खनिज भंडार की कीमत कम से कम 900 अरब डॉलर है। आंकड़ों के अनुसार, अफगानिस्तान में विशाल खनिज संपदा का अब तक दोहन नहीं हुआ है, जिसमें सोना, तांबा, एल्युमीनियम, लोहा, ग्रेफाइट इत्यादि शामिल हैं।
चीन दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि वह महाशक्ति बनने की अपनी महत्वाकांक्षा के अनुरूप अमेरिका की तरह दूसरे देशों में अपना प्रभाव फैला सकता है। वह अफगानिस्तान के जरिये अपने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विस्तार करना चाहता है, जो कई पड़ोसियों के लिए सुरक्षा चिंताएं पैदा कर सकता है। वह अफगानिस्तान में अमेरिका विरोधी भावनाओं का फायदा उठा सकता है और तेल की खोज शुरू कर सकता है, जो उसकी आर्थिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि 'साम्राज्यों की कब्रगाह' कहे जाने वाले और अमेरिका सहित कई देशों की हार का गवाह रहे अफगानिस्तान में चीन आसानी से सफल नहीं हो सकता। हालांकि वहां चीन का प्रवेश खनिजों के दोहन की नीति पर आधारित है, इसलिए वह अफगान लोगों के लिए भारी कमाई के अलावा रोजगार के क्षेत्र में लाभ पहुंचाने की धारणा बनाने की कोशिश कर रहा है।
चीन ने पाकिस्तान को छोड़ दिया है और अब तालिबान को फंसाना चाहता है, जो पहले ही उसके जाल में फंस चुका है। अस्तित्व बचाने की तालिबान की हताश कोशिश चीन के साथ रिश्ते बनाने का एक प्रमुख कारक है, इसलिए चीन ने इस दुर्लभ अवसर को लपक लिया है। चीन अपनी बेल्ट ऐंड रोड पहल का विस्तार करने के लिए अफगानिस्तान को निशाना बनाएगा, जिसमें अरबों डॉलर का निवेश शामिल है। तालिबान इसे रोजगार पैदा करने और विकास के मार्ग की संभावित पद्धति के रूप में स्वीकार कर सकता है, जो एक छलावा साबित हो सकता है। अपनी आशाजनक सोच के मुताबिक पाकिस्तान ने दुनिया को यह बताते की कोशिश की कि वह तालिबान को निर्देशित करेगा, इसलिए उसने दोहा वार्ता से भारत को बाहर रखने की चालाकी की। लेकिन पाकिस्तान और तालिबान के बीच उथल-पुथल और तनावपूर्ण संबंधों ने सारा परिदृश्य ही बदल डाला। वर्ष 2021 में जबसे तालिबान ने काबुल में सत्ता संभाली, पाकिस्तान अग्रणी मोर्चे पर था, लेकिन उसकी यह खुशी अल्पकालिक रही, क्योंकि पाकिस्तान ने भारत पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को बढ़ावा देने और समर्थन करने का आरोप लगाया है, जिसने वर्ष 2022 में पाकिस्तान में 179 लोगों को मार दिया। टीटीपी ने जनवरी, 2023 में एक मस्जिद पर हमले में 100 से अधिक लोगों की हत्या कर दी, जो इसकी सबसे घातक कार्रवाइयों में से एक थी और इसने पाकिस्तान के लोगों और सेना को हिलाकर रख दिया था।
जी-20 में भारत की शानदार सफलता से चिढ़कर चीन तालिबान पर काबू पाने की कोशिश कर सकता है, जिसे सत्ता संभालने के दो साल बीत जाने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मान्यता न मिलने पर एक संरक्षक की सख्त जरूरत है। जी-20 शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग की अनुपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि भारत ने सर्वसम्मति से नई दिल्ली घोषणा पत्र जारी किया, जिससे कूटनीतिक जगत में भारत का कद और बढ़ गया। यदि तालिबान चीन द्वारा बिछाए गए जाल में फंस जाते हैं, तो भारत को तालिबान से निपटने में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा, अफगानिस्तान में चीन की सक्रिय भागीदारी के बाद भारत का उत्तर-दक्षिण-गलियारा प्रभावित हो सकता है। तालिबान ने अतीत में अफगानिस्तान में भारत के निवेश की सराहना की है, लेकिन भविष्य के निवेश के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं है।