अमेरिकी नेतृत्व किसी न किसी उलझन का शिकार रहता है। हिंसाग्रस्त अफगानिस्तान के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। उसने अफगानिस्तान में कदम जमा तो लिए, मगर अंदाजा नहीं था कि हालात इस कदर करवट लेंगे कि वहां से निकलना मुश्किल हो जाएगा। अमेरिका चाहता है कि वह वहां से इस तरह वापसी करे कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में उसकी साख भी बनी रहे और अफगानिस्तान छोड़ने के बाद तालिबान अफगान प्रशासन को परेशान न करे।
देश में जारी संघर्ष के खात्मे के लिए अमेरिका अब तक तालिबान से कतर की राजधानी दोहा में कई दौर की वार्ताएं कर चुका है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों के जाने के संभावित समय के मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच में गतिरोध बना हुआ है। अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने से पहले अमेरिका तालिबान से सुरक्षा गारंटी, संघर्ष विराम, और देश की सरकार एवं अफगान प्रतिनिधियों के साथ अफगानिस्तान में संवाद सहित अन्य प्रतिबद्धताएं चाहता है। जबकि तालिबान का जोर है कि जब तक अमेरिका अपने सैनिकों की वापसी का समय तय नहीं करता, तब तक वह इसमें से कोई चीज नहीं करेगा।