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अफगानिस्तान में उलझन में अमेरिका

कुलदीप तलवार
Updated Tue, 14 May 2019 06:35 PM IST
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afghanistan election rally(File Photo)

अमेरिकी नेतृत्व किसी न किसी उलझन का शिकार रहता है। हिंसाग्रस्त अफगानिस्तान के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। उसने अफगानिस्तान में कदम जमा तो लिए, मगर अंदाजा नहीं था कि हालात इस कदर करवट लेंगे कि वहां से निकलना मुश्किल हो जाएगा। अमेरिका चाहता है कि वह वहां से इस तरह वापसी करे कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में उसकी साख भी बनी रहे और अफगानिस्तान छोड़ने के बाद तालिबान अफगान प्रशासन को परेशान न करे।

देश में जारी संघर्ष के खात्मे के लिए अमेरिका अब तक तालिबान से कतर की राजधानी दोहा में कई दौर की वार्ताएं कर चुका है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों के जाने के संभावित समय के मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच में गतिरोध बना हुआ है। अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने से पहले अमेरिका तालिबान से सुरक्षा गारंटी, संघर्ष विराम, और देश की सरकार एवं अफगान प्रतिनिधियों के साथ अफगानिस्तान में संवाद सहित अन्य प्रतिबद्धताएं चाहता है। जबकि तालिबान का जोर है कि जब तक अमेरिका अपने सैनिकों की वापसी का समय तय नहीं करता, तब तक वह इसमें से कोई चीज नहीं करेगा।



तालिबान अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी की सरकार के साथ वार्ता के लिए तैयार नहीं हो रहे और वे सीधे अमेरिका के साथ सारे मामले को तय करना चाहते हैं। उनका कहना है कि अफगान सरकार न तो वहां की जनता का प्रतिनिधित्व करती है और न ही इसे जनसमर्थन प्राप्त है। सरकार अमेरिका की ताकत के जोर पर कायम है। अमेरिका व तालिबान के बीच वार्ता में अब तक सफलता न मिलने के लिए पाकिस्तान का रवैया भी जिम्मेदार है। पाकिस्तान अफगानिस्तान में पहले की तरह एक कठपुतली सरकार स्थापित करने के लिए तालिबान को हथियार व हर तरह की मदद दे रहा है। तालिबान का आधे से ज्यादा अफगानिस्तान पर कब्जा हो चुका है।
 

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afghanistan election rally(File Photo)
अमेरिकी नेतृत्व किसी न किसी उलझन का शिकार रहता है। हिंसाग्रस्त अफगानिस्तान के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। उसने अफगानिस्तान में कदम जमा तो लिए, मगर अंदाजा नहीं था कि हालात इस कदर करवट लेंगे कि वहां से निकलना मुश्किल हो जाएगा। अमेरिका चाहता है कि वह वहां से इस तरह वापसी करे कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में उसकी साख भी बनी रहे और अफगानिस्तान छोड़ने के बाद तालिबान अफगान प्रशासन को परेशान न करे।

देश में जारी संघर्ष के खात्मे के लिए अमेरिका अब तक तालिबान से कतर की राजधानी दोहा में कई दौर की वार्ताएं कर चुका है, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों के जाने के संभावित समय के मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच में गतिरोध बना हुआ है। अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने से पहले अमेरिका तालिबान से सुरक्षा गारंटी, संघर्ष विराम, और देश की सरकार एवं अफगान प्रतिनिधियों के साथ अफगानिस्तान में संवाद सहित अन्य प्रतिबद्धताएं चाहता है। जबकि तालिबान का जोर है कि जब तक अमेरिका अपने सैनिकों की वापसी का समय तय नहीं करता, तब तक वह इसमें से कोई चीज नहीं करेगा।

तालिबान अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी की सरकार के साथ वार्ता के लिए तैयार नहीं हो रहे और वे सीधे अमेरिका के साथ सारे मामले को तय करना चाहते हैं। उनका कहना है कि अफगान सरकार न तो वहां की जनता का प्रतिनिधित्व करती है और न ही इसे जनसमर्थन प्राप्त है। सरकार अमेरिका की ताकत के जोर पर कायम है। अमेरिका व तालिबान के बीच वार्ता में अब तक सफलता न मिलने के लिए पाकिस्तान का रवैया भी जिम्मेदार है। पाकिस्तान अफगानिस्तान में पहले की तरह एक कठपुतली सरकार स्थापित करने के लिए तालिबान को हथियार व हर तरह की मदद दे रहा है। तालिबान का आधे से ज्यादा अफगानिस्तान पर कब्जा हो चुका है।
 

हाल ही में पाक के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा है कि चूंकि अफगान तालिबान अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार के साथ बातचीत नहीं करना चाहता है, इसीलिए अफगानिस्तान में एक कार्यवाहक सरकार कायम हो, जो अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत को किसी सकारात्मक नतीजे पर पहुंचा सके। अफगान सरकर ने इमरान खान के इस बयान को गैर-जिम्मेदाराना बताया और इसे अपने अंदरूनी मामलों में दखलअंदाजी माना। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान भारत में आतंक का इस्तेमाल हथियार के तौर पर करता है। ऐसा ही अफगानिस्तान में भी करता है, क्योंकि उसे अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव का डर बना हुआ है।

उधर तालिबान ने अफगानिस्तान में हमले तेज कर दिये हैं। उनका कहना है कि जब तक अमेरिकी व नाटो फौज देश में मौजूद है, तब तक जंग जारी रहेगी। इसकी ताजा मिसाल पवित्र रमजान के तीसरे दिन तालिबान ने काबुल में एक अंतरराष्ट्रीय मदद देने वाले संगठन के दफ्तर पर बम धमाका किया, जिसमें कई लोग मारे गए व नौ लोग घायल हुए। ऐसे समाचार भी आ रहे हैं कि तालिबान और इस्लामिक स्टेट के बीच कब्जे की जंग एक बार फिर शुरू हो गई है। अगर यह कब्जे की लड़ाई तेज हो गई, तो अफगानिस्तान के हालात और पेचीदा हो जाएंगे।

तालिबान स्वीकार कर चुके हैं कि वे यह जंग जीत नहीं सकते, इसलिए इसके राजनीतिक हल के लिए अमेरिका के साथ वार्ता करते हैं। अमेरिका व अफगान सरकार की भी यही इच्छा है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि अफगानिस्तान सरकार के प्रतिनिधि भी वार्ता में शामिल किए जाएं। अब देखना यह है कि अगले कुछ दिनों में अफगानिस्तान के हालात क्या शक्ल अख्तियार करते हैं।
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