हक नहीं खैरात देने लगे
इक नई सौगात देने लगे।
इश्क करना आपको आ गया
अब वही जज्बात देने लगे।
रौशनी का नाम देकर हमें
फिर अंधेरी रात देने लगे।
और भी जालिम यहां पर हुए
आप सबको मात देने लगे।
बादलों को तरसती रेत को
धूप की बरसात देने लगे।
तोड़कर कसमें सभी प्यार की
एक झूठी बात देने लगे।
जानते सब लोग 'तनहा' यहां
किसलिए ये दाद देने लगे।
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खुदा का सवाल
झूठ से दोस्ती नहीं करते
हम कभी बस यही नहीं करते।
इक खुदा ने सवाल पूछा है
आप क्यों बंदगी नहीं करते।
साथ जीना है साथ मरना भी
बस तभी खुदकुशी नहीं करते।
बेवफा हम उन्हें कहें कैसे
बेवफाई वही नहीं करते।
आज कहने लगे हमें आकर
आप क्यों आशिकी नहीं करते।
क्यों बुलाते हो तुम रकीबों को
यार से दिल्लगी नहीं करते।
याद 'तनहा' उन्हें जमाना सब
बात पर आपकी नहीं करते।