शहर में तीन महिलाओं की मौत हो गई। तीनों समाज के अलग-अलग वर्ग से ताल्लुक रखती थीं। एक संपन्न परिवार की थी और वह समाज सेविका भी थी। लोग उन्हें देवी की तरह पूजते थे। दूसरी एक मध्यवर्गीय नौकरीपेशा महिला थी। वह दिन-रात घर और दफ्तर के कामकाज में रमी रहती थी। तीसरी महिला निम्न वर्ग से ताल्लुक रखती थी, क्योंकि वह मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का गुजारा चलाती और करीब-करीब रोज ही अपने शराबी पति के हाथों पिटती थी।
इसके बावजूद तीनों में एक समानता थी कि वे एक साथ स्वर्ग पहुंचीं। कर्मों का लेखा-जोखा देखकर फैसला करने वाले धर्मराज के साथ उस दिन भगवान भी न्यायपीठ पर थे। अचानक उन्होंने तीनों से सवाल किया, सुना है कि पृथ्वी पर लोग स्त्री को देवी मानते हैं। क्या यह सच है?
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इस पर संपन्न परिवार की महिला बोली, 'हां प्रभु! मेरे लिए तो लोग कहते थे कि यह तो देवी है, देवी।' नौकरीपेशा महिला बोली, 'मेरे साथ तो ऐसा कुछ नहीं होता था। पर जब भी मैं दफ्तर से लौटती, तो मेरी सास सहेलियों के पास से यह कहती हुई उठ जाती कि देवी जी आ गई हैं।
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भगवान ने तीसरी महिला की ओर देखा। मजदूर वर्ग की उस महिला ने कहा, 'भगवान! मैं कुछ पढ़ी-लिखी नहीं हूं और आपने जो पूछा, उसका मतलब भी नहीं समझती। लेकिन जब मेरा पति शराब के नशे में मुझे मारता था, तो पड़ोसी जन कहते थे कि आज फिर बेचारी की पूजा हो रही है। एक दिन मुझे गुस्सा आ गया। मैंने सिलबट्टा उठाकर उसका सिर फोड़ दिया। लोग कहने लगे-आज तो यह साक्षात चंडी देवी लग रही है।
भगवान ने धर्मराज की ओर देखा। धर्मराज मुस्कराए और बोले, देवी स्त्री का ही पर्याय है प्रभु। इस नाम से पुकार लेने पर कौन-सा भाग्य बदल जाता है।