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विश्व हिंदी सम्मेलन का हासिल

उमेश चतुर्वेदी
Updated Mon, 20 Aug 2018 06:33 PM IST
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उमेश चतुर्वेदी

विश्व हिंदी सम्मेलन की 43 वर्ष की यात्रा कोई कम नहीं है। मॉरीशस में हो रहे 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के मौके पर देश में यह सवाल जरूर उठ रहा है, कि जिस उद्देश्य से यह सम्मेलन शुरू हुआ, क्या उसे वह पूरा कर पाया है।



वर्ष 1975 को लोकतंत्र के लिए आपातकाल रूपी काले धब्बे के लिए ही याद किया जाता है। इसी साल 10 जनवरी को नागपुर में पहला विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ था। गांधी जी द्वारा स्थापित राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की पहल पर हुए इस आयोजन में सम्मेलन ने तीन लक्ष्य निर्धारित किए थे, लेकिन उनमें से दो बेहद महत्वपूर्ण रहे। पहला यह कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिलाया जाए और दूसरा वर्धा में विश्व हिंदी विद्यापीठ की स्थापना हो।

 

हमने जिस लोकतंत्र को स्वीकार किया है, उसमें हर नाकामी के लिए राजनीतिक नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराने की ही ज्यादा कोशिश होती है। लेकिन हम भूल जाते हैं कि अपनी नौकरशाही का जो लौह आवरण है, वह कई बार सकारात्मक लक्ष्यों को पूरा होने की राह में अड़ंगा लगा देता है। हिंदी अभी तक संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा नहीं बन पाई है। ले-देकर दूसरा लक्ष्य ही पूरा हो पाया है। वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय जीवंत हो चुका है।


हालांकि 1997 में स्थापना के बाद कई वर्षों तक यह विश्वविद्यालय पठन-पाठन के केंद्र के बजाय आपदा के समय लगाए जाने वाले कैंप कार्यालय की तरह दिल्ली से काम करता रहा है। दिलचस्प यह है कि उस समय इस विश्वविद्यालय की कमान अशोक वाजपेयी के हाथ थी, जो साहित्यकार तो हैं ही, नौकरशाह भी रहे हैं।

 

विश्व हिंदी सम्मेलन दस बार आयोजित होने के बावजूद संयुक्त राष्ट्र के मोर्चे पर हिंदी इतनी ही आगे बढ़ पाई है कि उसका कार्यालय अब हिंदी में भी ट्वीट करने लगा है। विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन करते वक्त विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की यह घोषणा उम्मीद जताती है कि संयुक्त राष्ट्र ने हिंदी में भी समाचारों का प्रसारण करना शुरू कर दिया है, जो फिलहाल साप्ताहिक तौर पर होता है। 43 साल में अगर हम इतनी ही यात्रा कर पाए हैं, तो यह मानने में क्यों गुरेज होना चाहिए कि हिंदी सम्मेलन कुछ लोगों की तफरीह का जरिया ज्यादा रहा और ठोस लक्ष्य हासिल करने की दिशा में इन्होंने गंभीर भूमिका कम ही निभाई।


मॉरीशस के बड़े हिंदी लेखक रामदेव धुरंधर ने सोशल मीडिया पर अपना दर्द बयान किया है। उन्होंने लिखा है कि चूंकि आयोजन में प्रतिभागी बनने के लिए भारतीय उच्चायोग ने 100 डॉलर की फीस निर्धारित कर रखी थी, इसलिए मॉरीशस के हिंदी प्रेमी भी अपने पूर्वजों की बोली-बानी के सम्मेलन में शामिल नहीं हो पाए। क्या भाषाओं की जनभागिता के बिना किसी एक कक्ष में सम्मेलन कर लेने, कुछ किताबों और पत्रिकाओं के विमोचन कर लेने भर से हिंदी का प्रसार हो जाएगा? न्यूयॉर्क की संस्था ‘द वर्ल्ड आल्मेनक ऐंड बुक ऑफ फैक्ट्स’ के 1999 के न्यूज पेपर एंटरप्राइजेज एसोसिएशन अंक के मुताबिक, दुनिया भर में हिंदी बोलने वालों की संख्या 130 करोड़ हो गई है और इस लिहाज से वह दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े अब भी हिंदी को चीनी और अरबी के बाद तीसरे ही स्थान पर रखते हैं। अगर इतने बड़े समुदाय की भाषा को उसका वैश्विक स्तर पर आधिकारिक महत्व नहीं मिल पा रहा है, तो हमें सोचना होगा कि आखिर हमारे प्रयासों में कमी कहां रह गई। 

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