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आ अब लौट चलें

Wed, 25 Feb 2015 06:11 PM IST
राजेंद्र शर्मा
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फागुन में मौसम आशिकाना होता तो सुना था। पर इस बार मौसम पलटियाना हो रहा है। जिधर भी देखो, लौटने का शोर है। और तो और, जंतर मंतर पर टोपियों और झंडों के बीच, अन्ना-अरविंद की जोड़ी भी लौट आई है। क्या हुआ कि अभी जोड़ी की टेंपरेरी वापसी ही हुई है। शॉर्ट-सी वापसी के बाद, अरविंद को मुख्यमंत्री कार्यालय लौटना है और अन्ना को रालेगण सिद्धि। पर वापसी की शुरुआत तो हो गई। अब राजधानी में अन्ना का आना-जाना लगा रहेगा। बेशक, आज मुद्दा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का है। बेशक, आज निशाने पर चुप रहने वाली नहीं, बहुत बोलने वाली सरकार है। फिर भी असली खबर तो अन्ना की वापसी है। एक न एक दिन भ्रष्टाचार से लड़ाई भी वापस लौट आएगी।
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वैसे अन्ना के संग अरविंद की वापसी जंतर मंतर पर ही नहीं हुई है। अरविंद की वापसी दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी हुई है। मफलरमैन की ऐसी जबर्दस्त वापसी हुई है कि बड़े-बड़े सुपर हीरो फीके नजर आने लगे हैं। जिन बिचारों को हारकर पैवेलियन लौटना पड़ा है, उनका तो खैर पूछना ही क्या! सुना है कि बेचारों के यहां हार के ठीकरे फोड़े जाने का मौसम लौट आया है। कोई किरण जी के सिर पर ठीकरा फोड़ रहा है, तो कोई अच्छे दिनों के आने में देरी के सिर पर। और कोई कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने वालों के सिर पर ठीकरा फोड़ रहा है, नाम लिए बिना।

मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वापसी सिर्फ अरविंद की नहीं हुई है। नीतीश कुमार भी अपनी त्यागी हुई कुर्सी पर लौट आए हैं। वाकई यह त्याग करने का टैम ही नहीं है। हड़पने वाले का गुजारा भले ही माफी मांगे बिना चल जाए, पर त्याग करने वालों को पब्लिक से बार-बार माफी मांगनी पड़ती है। केजरीवाल ने पूरे चुनाव प्रचार में माफी मांगी और नीतीश कुमार कुर्सी पर लौटते-लौटते मांग रहे हैं। कुर्सी पर वापसी तो हो गई, अब कुर्सी त्याग की वापसी हर्गिज नहीं होने देंगे! डेमोक्रेसी में पब्लिक की डिमांड का ख्याल तो रखना ही पड़ता है।
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