महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का एक सामाजिक-राजनीतिक सुधारक के रूप में उदय ऐसे समय हुआ था, जब पूरा देश विकट परिस्थितियों से गुजर रहा था। तब देश गुलाम था, सामाजिक, आर्थिक एवं शिक्षा के क्षेत्र में जनता पिछड़ी हुई थी और उसमें राजनीतिक चेतना का अभाव था।
वैसे तो बचपन में ही मालवीय जी के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हो गई थी, पर राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान वर्ष 1886 में कोलकाता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दूसरे वार्षिक अधिवेशन से हुई। उनका सार्वजनिक जीवन प्रयाग हिंदू समाज के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में हुआ। बाद में वह पत्रकार बने, और फिर वकील भी। पर जब उनकी वकालत चरम पर थी, तभी उन्होंने यह पेशा छोड़कर अपना जीवन राष्ट्रसेवा तथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए समर्पित कर दिया।
राष्ट्रभाषा हिंदी और देवनागरी लिपि के प्रति उनका अटूट प्रेम था। उन्होंने 1898 में संयुक्त प्रांत (मौजूदा उत्तर प्रदेश) के लेफ्टिनेंट गर्वनर को हिंदी के विषय में ज्ञापन दिया तथा तीन वर्ष के कठिन परिश्रम के बाद कचहरियों में प्रचलित फारसी के साथ देवनागरी लिपि को भी स्वीकृत कराया। प्रांतीय काउंसिल के सदस्य के रूप में अपने नौ साल के कार्यकाल में वह लगान में कमी, कृषि शिक्षा, औद्योगिक विकास, सिंचाई, स्वास्थ्य आदि सामाजिक सुविधाओं की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करते रहे। वित्तीय व्यवस्था पर सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए उन्होंने कहा था कि वित्त व्यवस्था केवल अंकगणित नहीं है।
वित्त व्यवस्था एक बड़ी नीति है। निर्दोष वित्त व्यवस्था बिना निर्दोष शासन के संभव नहीं है, और निर्दोष शासन भी बिना निर्दोष वित्त व्यवस्था के संभव नहीं है। मालवीय जी का उदार हिंदुत्व किसी धर्म या समुदाय का विरोधी नहीं था। हिंदू जागरण के अग्रणी नायक के रूप में उनका नाम प्रसिद्ध है, लेकिन वह सभी धर्मों और समुदायों की अधिकार रक्षा के प्रति सजग रहे। वर्ष 1922 में मुल्तान के सांप्रदायिक उपद्रवों के दौरान उन्होंने हकीम अजमल खां और राजेंद्र प्रसाद के साथ स्थिति की जांच की और लाहौर में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द पर मार्मिक भाषण दिया।
उन्होंने अनेक मस्जिदों का निर्माण और सुधार करवाया एवं लंदन के गिरिजाघर में बाइबिल हाथ में लेकर प्रार्थना की। हिंदू महासभा से जुड़ा यह व्यक्ति मुस्लिम लीग के अधिवेशन में भी भाग लेता था। हिंदुओं की जाति-वर्ण संबंधी रूढ़ियों पर प्रहार करते हुए उन्होंने दलितों को मंत्र दीक्षा देने का ऐतिहासिक कार्य भी किया था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने दलित छात्रों की निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की।
अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में मालवीय जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान शिक्षा के क्षेत्र में रहा। वह शिक्षा को मानव मात्र का अधिकार तथा उसका समुचित प्रबंध सरकार का कर्तव्य समझते थे। आज जिस निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की बात की जा रही है, सौ साल पहले मालवीय जी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में सर्वसाधारण के लिए इस शिक्षा के पक्षधर थे। उनका मानना था कि पुरुषों की शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण स्त्रियों की शिक्षा है, क्योंकि वे ही देश की भावी संतानों की माताएं हैं।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले देश के पांचों विश्वविद्यालय- इलाहाबाद, मद्रास, कलकत्ता, मुंबई और लाहौर, वस्तुतः परीक्षा केंद्र थे। मदन मोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के रूप में देश में पहली बार एक पूर्ण आवासीय विश्वविद्यालय की स्थापना की पहल की, जो हर तरह से नालंदा एवं तक्षशिक्षा विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करता था, तथा जिसके एक ही परिसर में कला, विज्ञान, वाणिज्य, कृषि विज्ञान, तकनीकी, संगीत और ललित कलाओं की पढ़ाई संभव थी।
वर्ष 1938 में कायाकल्प के बाद उनका शरीर दुर्बल होता चला गया, पर 12 नवंबर, 1946 को जब उनका देहावसान हुआ, तब तक वह स्वधर्म, स्वदेशी, स्वभाषा, स्वराज्य और स्वाधीनता के साथ सर्वधर्म समभाव, स्त्री शिक्षा, दलित समस्या, राजनीतिक एवं सामाजिक समस्याओं के प्रति लगातार सक्रिय रहे।