बीते दो हफ्तों में काफी कुछ हुआ है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि दिल्ली में हुई त्रासदी पर बहस अब हर घर में पहुंच गई है। इस दुख से हम सभी जुड़े हैं और बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है, क्योंकि हम सभी इस अकथनीय अपराध के रोकथाम का उपाय तलाश रहे हैं। सिंगापुर में दिवंगत हुई लड़की का शव जब तड़के तीन बजे पालम हवाई अड्डे पर पहुंचा, तो वहां प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं सोनिया गांधी मौजूद थीं।
उसकी अंत्येष्टि में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित एवं गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह मौजूद थे। यह राष्ट्र के लिए एक सही संकेत है, जो ऐसी बर्बरता के खिलाफ सरकार की प्रतिबद्धता दर्शाता है। देश के कई शहरों में जनप्रतिरोध जारी है, पर दुर्भाग्य की बात है कि कुछ समय के लिए प्रतिरोध की पवित्रता को असामाजिक तत्वों ने नुकसान पहुंचाया।
बीते पखवाड़े में मीडिया ने देश भर के सभी इलाकों में घटी ऐसी घटनाओं के बारे में खबरें दीं। यह भयावह अनुभव है कि बाल दुर्व्यवहार, छेड़छाड़, सामूहिक बलात्कार, तेजाब फेंकने जैसे सैकड़ों मामले सामने आए। दिल्ली के जनाक्रोश के बाद स्त्री सुरक्षा का मुद्दा अखबारों के पहले पेज की सुर्खी बन गया है। दशकों से महिलाएं लैंगिक भेदभाव और घर एवं घरों से बाहर कई तरह के दुर्व्यवहार झेलती आ रही हैं, लेकिन पहली बार इस मुद्दे को इतनी प्रमुखता मिली है।
सरसरी तौर पर इस पर प्रतिक्रिया अतिवादी लग सकती हैं, पर यह बेहद वास्तविक है। जाहिर है, बदलाव तेजी से होगा। हम अक्सर जनसांख्यिकी प्रणाली पर बात करते हैं, लेकिन इस मुद्दे पर मुझे लगता है कि हमारे युवा एक क्रांति के लिए सुलग रहे हैं। लोकतंत्र में कोई भी जनभावनाओं की अनदेखी नहीं कर सकता। पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस वर्मा अपनी टीम के साथ बलात्कार संबंधी मौजूदा कानून में बदलाव पर काम कर रहे हैं। इस विषय के विशेषज्ञ अपनी राय उन्हें देंगे।
मीडिया इस दिशा में दृढ़ता से काम कर रहा है और मेरा मानना है कि हम जो कुछ भी सुनते-पढ़ते हैं, उस पर ध्यान देना चाहिए। यह समझने की बात है कि गुस्से में काफी कुछ कहा जा सकता है, क्योंकि इस मुद्दे ने बड़े पैमाने पर लोगों में गुस्सा पैदा किया है, लेकिन महिलाओं के प्रति मौजूदा व्यवहार को लेकर अगर हम दोषारोपण करते रहेंगे, तो कुछ भी हासिल नहीं होनेवाला। इसमें कोई संदेह नहीं कि बदलाव की शुरुआत बगैर किसी जाति एवं वर्ग भेद के हमारी मानसिकता एवं समाज में होनी है।
बदलाव का असर दिखने भी लगा है। पिछले दिनों उत्तर भारत के लोकप्रिय गायक हनी सिंह को लेकर काफी हंगामा हुआ। नए साल के मौके पर उनके कार्यक्रम रद्द कर दिए गए, क्योंकि उनके गीतों में 'बलात्कार' को महिमामंडित किया गया है। मुझे हैरानी होगी अगर इस मूर्खता के लिए सिर्फ उन्हें ही दोषी माना जाएगा। मैं कह सकता हूं कि पिछले एक पखवाड़े में काफी कुछ बदल गया है। अब जब हम वर्तमान में जीते और भविष्य की ओर देखते हैं, तो अतीत की बात करने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन क्या हमें उन तमाम चीजों पर सवाल नहीं उठाना चाहिए, जिनके कारण यह बर्बरता हुई है और देश भर के लोग आहत हुए हैं!
मीडिया का रुख आक्रामक है। कई बार मुझे भी लगता कि मीडिया अति कर रहा है, लेकिन फिर सोचता हूं कि अगर चौबीसों घंटे मीडिया नहीं होता, तो हम क्या करते! निस्संदेह सोशल मीडिया के साथ-साथ प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने हमें गौरवान्वित किया है। अक्सर लोग टेलीविजन बहसों में राजनेता, पुलिस और न्यायपालिका पर निशाना साधते हैं। कुछ हद तक इसे उचित ठहराया जा सकता है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या समाज और हमारे घरों में है। हम रूढ़िवादी खाप मानसिकता की आलोचना करते हैं, लेकिन मीडिया अपनी रिपोर्टों के जरिये हर क्षण हमें याद दिलाता है कि ऐसी मानसिकता केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है।
काश! हमारे पास कोई जादुई छड़ी होती, तो हम पूर्वाग्रह और विकृत सामंती नजरिये वाली इस सदी को दूर हटा सकते। बहरहाल, व्यावहारिक रूप से हमें अब इस मुद्दे को उन लोगों पर छोड़ देना चाहिए, जिनके पास इस क्षेत्र में लघु एवं दीर्घावधि की योजना तैयार करने का व्यापक अनुभव है। जब मैं यह लिख रहा हूं, मीडिया में तृणमूल कांग्रेस के एक कार्यकर्ता द्वारा अश्लील नृत्य पर पैसा लुटाने की खबरें दिखाई जा रही हैं। बेशक इसके लिए पूरी पार्टी को दोषी ठहराना सही नहीं होगा, लेकिन इसकी मुखिया ममता बनर्जी के लिए यह एक अच्छा अवसर है कि वह अपने कार्यकर्ताओं को सकारात्मक संदेश देकर एक उदाहरण प्रस्तुत करें।
इसी दौरान श्रीनगर में एक लड़की पर तेजाब फेंका गया है। हमारे सामने सीकर के 11 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार का मामला भी है, जिसका जयपुर में बारह बार ऑपरेशन हो चुका है। उसके साथ बलात्कार करने वाले छह में से चार दरिंदे जमानत पर बाहर हैं, जबकि कैद दो आरोपियों की शिनाख्त होनी है। मुझे लगता है कि राज्य के मुख्यमंत्री इस मामले में तेज कार्रवाई करेंगे। लाखों लोगों के दिलों में सुलगता स्त्री-सुरक्षा का मुद्दा अब एक आंदोलन बन गया है, क्योंकि हर परिवार किसी न किसी रूप में इससे प्रभावित है।