फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शिक्षिका के शब्दों पर मुझे यकीन नहीं होता था कि ऐसी अद्भुत चीजें भी होती हैं

Thu, 04 Jan 2018 07:06 PM IST
टेड ह्यूज
विज्ञापन
book store
विज्ञापन
आठ या नौ वर्ष की उम्र से मैंने कॉमिक्स पढ़ना शुरू किया। मेरे माता-पिता ने अखबारों की एक दुकान खरीदी, जहां से मैं कॉमिक्स लाकर पढ़ता और फिर उसे दुकान में वापस रख देता। यह सिलसिला बारह-तेरह वर्ष तक चलता रहा। फिर मेरी मां ने बच्चों का इनसाइक्लोपीडिया खरीदा, जिसमें लोकगीत और लोककथाएं भी संकलित थीं। छोटी-छोटी लोककथाएं।
विज्ञापन


उन लोककथाओं व लोकगीतों को पढ़कर मैं हैरान रह गया, मुझे यकीन नहीं होता था कि ऐसी अद्भुत चीजें भी होती हैं। अब तक मैंने मां द्वारा ही छोटी कहानियां सुनी थीं, जो ज्यादातर वह गढ़कर सुनाती थीं। मेरे पिता हिअवथा के लंबे अंश जानते थे, जिसका वह पाठ करते थे। जीवन भर के लिए उन लोककथाओं का साहित्यिक प्रभाव मुझ पर पड़ा ।

तब से मैंने लोककथाओं, लोकगीतों और पौराणिक कहानियों का संग्रह करना शुरू कर दिया। मैंने पहली हास्य कविता तब लिखी, जब मैं ग्यारह वर्ष का था। मैंने महसूस किया कि मैंने जो लिखा, वह मेरे शिक्षकों और साथियों को पसंद आया। मैंने खुद को एक लेखक मानना शुरू कर दिया।
विज्ञापन


चौदह वर्ष की उम्र में मैंने किप्लिंग की कविताएं पढ़ीं। उसकी लय और ताल ने मुझे बेहद प्रभावित किया। मैंने लयबद्ध कविताएं लिखनी शुरू कीं और अपनी शिक्षिका को दिखाना शुरू किया, जो कविताओं की मुरीद थीं। उन्होंने मेरी कविता पढ़कर कहा था, यह वाकई दिलचस्प है। यह असली कविता है। आज भी उनके शब्द मेरे कानों में गूंज रहे हैं। उस क्षण को याद कर मैं आज भी रोमांचित हो उठता हूं। उनके शब्दों ने मुझे अपने जीवन के सबसे बड़े सुख (कविता लिखने) के लिए प्रेरित किया।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें