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एक ग्रामीण की कहानी, जिसने राजा को अपनी सोच बदलने के लिए मजबूर किया

Fri, 17 May 2019 01:46 PM IST
दीपाली अग्रवाल अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
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- फोटो : .
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एक राजा अपने राज्य के लोगों को खुश रखने की पूरी कोशिश करता था, पर हर बार उसे निराशा ही हाथ लगती। एक दिन राजा को पता चला कि लोग उससे खुश नहीं हैं। राजा को यह जानकर बहुत दुख हुआ। उसने तय किया कि वह पूरे राज्य का पैदल भ्रमण करेगा और राज्य के लोगों की परेशानियों को समझने की कोशिश करेगा। पहले दिन राजा सुबह पांच बजे ही महल से निकल पड़ा। राजा को चलने की आदत तो थी नहीं, ऊपर से सड़कें भी उसी इलाके में बनीं थीं, जिन पर राजा रोज आता-जाता था।

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इसीलिए राजा को पहली बार पथरीले रास्तों पर चलना पड़ रहा था। ऐसे में, शाम तक राजा की हिम्मत ने जवाब दे दिया। उसने एक जगह डेरा डालने का फैसला किया। राजा ने वहीं एक गांव में दरबार लगाया। राज्य की बदतर सड़कों पर बात होने लगी। राजा ने आदेश दिया कि पूरे राज्य में चमड़े की सड़कें बनवा दी जाएं। राजा को लगा कि यह सुनकर लोग खुश हो जाएंगे। लेकिन लोग खामोश ही थे। राजा ने एक ग्रामीण से पूछा, क्यों, अब तुम खुश तो हो न?

वह व्यक्ति काफी देर तक शांत खड़ा रहा। राजा को यह देखकर बहुत गुस्सा आया। उसे लगा कि जनता का दिमाग खराब हो गया है। मैं इसकी भलाई के लिए इतना कर रहा हूं, फिर भी इसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता। तब उस ग्रामीण ने कहा, महाराज, आपने यह तो कह दिया कि पूरे राज्य में चमड़े की सड़कें बनवा दी जाएं, पर यह विचार नहीं किया कि चमड़े की सड़क बनवाने के लिए कितने जानवरों को मारना पड़ेगा। राज्य का कितना पैसा खर्च हो जाएगा। पूरे राज्य में चमड़े की सड़कें बनवाने के बजाय अगर जूते बनवाए जाएं, तो ज्यादा व्यावहारिक होगा। यह सुनकर राजा हैरान रह गया। उसकी समझ में आ गया कि वह कहां गलती कर रहा था।

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