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अंतर्ध्वनि: नींद में हमारी आत्मा बच्चे की तरह निर्मल और पवित्र हो जाती है

Tue, 27 Aug 2019 11:51 PM IST
देव कश्यप कारेल चापेक
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सांकेतिक तस्वीर
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रात होते ही दूसरी जिंदगी शुरू हो जाती है, पीड़ा और दुविधा से भरी हुई। जो आदमी सो नहीं पाता, वह किसी भी चीज से छुटकारा नहीं पा सकता। जब आदमी सो नहीं पाता, तो शुरू-शुरू में वह किसी के बारे में कुछ नहीं सोचना चाहता।

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वह या तो गिनती गिनने लगता है, या प्रार्थना करने लगता है। फिर अचानक उसे बीच में ही खयाल आता है- हे ईश्वर, कल मैं अमुक काम करना भूल गया। और बाद में एक नया ख्याल तंग करने लगता है कि कल सौदा खरीदते समय दुकानदार ने उसे ठग लिया था। फिर उसे सहसा याद आता है कि उस दिन उसकी पत्नी या मित्र ने कितने अजीब ढंग से उससे बातचीत की थी। नींद सिर्फ एक शारीरिक विश्राम नहीं है, नींद एक तरह से बीते हुए दिन का प्रायश्चित और शुद्धिकरण है।

वह क्षमादान है। अच्छी नींद के पहले कुछ मिनटों में हर व्यक्ति की आत्मा बच्चे की तरह निर्मल और पवित्र हो जाती है। नींद एक गहरे, अंधेरे पानी की तरह है। उसमें वह सबकुछ बह जाता है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते और जिसके बारे में हमें कुछ नहीं जानना चाहिए। हमारे भीतर जो अजीब-सी कीचड़ जमा हो जाती है, नींद उसे बहाकर उस अचेतन में डुबो देती है, जो अपने में असीम है।
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हमारी नीचता और कायरता...रोजमर्रा के हमारे कुलबुलाते पाप, हमारी लज्जास्पद मूर्खताएं और असफलताएं, अपने प्रिय लोगों की आंखों में झूठ और घृणा देखने की पीड़ा, वे लोग जिन पर हम लांछन लगाते हैं, और वे लोग जो हम पर लांछन लगाते हैं...ये सब चीजें रात की सुप्त घड़ियों में चुपचाप चेतना के नीचे बह जाती है। नींद की दया असीम है...वह न केवल हमें क्षमा कर देती है, बल्कि उन सबको भी, जो हमारे प्रति गुनाहगार हैं।
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(चेकोस्लोवाकिया के प्रख्यात लेखक)

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