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अंतर्ध्वनि: मैं कला-संस्कार को मनुष्य की नैसर्गिक वृत्ति मानता हूं

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सांकेतिक तस्वीर
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जब मेरा बच्चा (पार्थिव) बहुत छोटा था, तब एक औरत खिलौनों की एक टोकरी अपने सिर पर उठाए उन्हें बेचने अहमदाबाद की गलियों में घूमती थी। वह हमारे घर भी आती थी। वह डुगडुगी बजाते हुए आती थी। 'डमक डमक' की आवाज आते ही पूरा मोहल्ला जान जाता था कि वह अपने खिलौने लेकर आ रही है- उसका नाम बहुत अच्छा था- धूलि।

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धूलि का अर्थ है-धूल। उसके लिए धूल (मिट्टी) ही देवता थी। उसने जो रूप बनाए, उसमें तकनीक, विधि व रचना-सामग्री तथा सरल-सादा हुनर का कमाल मुख्य था। इन खिलौनों को बनाए आज लगभग चालीस साल हो गए हैं, फिर भी कच्ची मिट्टी से बने होने के बावजूद ये सही-सलामत हैं। इन खिलौनों की पूरी गढ़त में अद्भुत कल्पनाशीलता व गहरी समझ-बूझ है। किसी भी महान आधुनिक शिल्प के बरक्स इन्हें रखा जा सकता है।

वह बच्चों की छुट्टियों वाले दिन ज्यादा आती थी, ताकि उसके खिलौने ज्यादा बिक सकें। इन खिलौनों को मैंने अपने दफ्तर की मेज के ऊपर भी रख रखा था। वहां इन खिलौनों को देखकर चार्ल्स इम्स ने इन्हें बहुत पसंद किया व सराहा था। इसी तरह एक दिन स्टेला क्रमरिश जब हमारे घर पर थीं, तब उन्हें भी ये खिलौने इतने पसंद आए कि उन्होंने इन खिलौनों को 'अननोन इंडिया' नामक प्रदर्शनी में रखना चाहा।
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स्टेला की इच्छा थी कि धूलि 'विवाह' पर एकाग्र खिलौने बना दे, जो धूलि ने बहुत सुंदर तरह से बनाए। इन खिलौनों के लिए उसे पर्याप्त राशि दी गई थी, लेकिन वहां केंद्र में रुपये नहीं, बल्कि अपनी रचनात्मकता का साझा व प्रेम था। इन खिलौनों की गुणवत्ता के कारण बहुत से हैं- अपना खेत, अपनी मिट्टी से लगाव, बच्चे, जीवन के ही एक भाग के रूप में कला, सादगी-सहजता, अंतर्दृष्टि, बनाने की रीत व तकनीक और इनमें से निकलते हुए कला-संस्कार, जिन्हें असल में मैं हरेक मानव में एक नैसर्गिक वृत्ति के रूप में देखता हूं।
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(मशहूर भारतीय चित्रकार और नृविज्ञानी)

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