चिट्ठी 1: अंधविश्वास या कुरीति को समझना होगा
गंगा में किए जाने वाले अस्थि विसर्जन और साधू-संतों की जल समाधि को, अंध-विश्वास व कुरीति का रूप बताने वाला गंगा संरक्षण राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल का यह बयान सैद्धांतिक रूप से गलत है या नहीं, इस पर सोच-विचार करने की जरूरत है। भले ही यह बयान गंगा स्वच्छता के संदर्भ में दिया गया हो, लेकिन इससे करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है और किसी की आस्था को ठेस पहुंचे, इससे पहले उस पर अगर सोच-विचार कर लिया जाए तो ज्यादा ठीक रहता है।
मान्यता है कि मां गंगा को राजा दशरथ अपने 60 हजार पुरखों की आत्मा की शांति व उनकी अस्थि प्रवाह के लिए कठोर तपस्या कर स्वर्ग से इस धरती पर लेकर आए थे। इसी तरह अपने पुरखों की आत्मा की शांति व उनकी अस्थि प्रवाह के लिए रोज हजारों हिंदू गंगा माता के पास पहुंचते हैं। गंगा अब पहले जैसी साफ स्वच्छ नदी नहीं रही। इसका एक कारण तो औद्योगिक क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषित जल है और दूसरा इस तरह के क्रियाकर्मों से होने वाला जल प्रदूषण है। जिस कारण गंगा दिनों दिन प्रदूषित होती जा रही है।
गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए तमाम सरकारों द्वारा प्रयास किए गए हैं, लेकिन उनके नतीजे सबको पता है। 2014 में भाजपा सरकार ने भी गंगा नदी को साफ-स्वच्छ रखने के लिए अपने ड्रीम प्रोजेक्ट 'नमामि गंगे' की शुरुआत की थी, लेकिन उसके अभी तक उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं देखे गए हैं। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने नदियों खासकर गंगा को स्वच्छ व साफ रखने के लिए जिस 'नमामि गंगे' मिशन के तहत 2137 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, उनमें से अब तक सफाई के नाम पर मात्र 170 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए हैं। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट हाल ही में अपनी नाराजगी भी जाहिर कर चुका है। इसका एक कारण सरकार की पहल में लोगों का साथ नहीं होना है।
यही कारण है कि सरकार की इस तरह की योजनाएं सफलता प्राप्त नहीं कर पातीं। अब राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल का बयान ठीक हो सकता है, लेकिन उन्हें यह भी देखना होगा कि इससे करोड़ों हिंदुओं की आस्था व विश्वास को ठेस न पहुंचे। सरकार को चाहिए कि वह गंगा की स्वच्छता से जुड़े समूहों, हिंदू धर्म से जुड़े लोगों से इस मसले पर बात करे, ताकि सदियों से अविरल धारा के रूप में बहती रहने वाली पावनी गंगा को इस प्रदूषण से मुक्ति मिल सके। गंगा का जल आज भी उतना ही शुद्ध, निर्मल और पवित्र होता, अगर हम समय रहते अपनी जिम्मेदारियों के प्रति थोड़ा सचेत रहते और फैक्ट्रियों से आने वाले कचरे व केमिकल्स, नालों के गंदे पानी व सीवर लाइनों से आने वाले प्रदूषित जल को गंगा में प्रवाहित होने से रोक पाते।
सरकार के साथ हमें समझना होगा कि 'नमामि गंगे' योजना को पूरी तरह क्रियान्वित किए बिना तथा वास्तविक तौर पर गंगा को दूषित करने वाले कारणों को दूर किए बिना गंगा को स्वच्छ व निर्मल नहीं किया जा सकता। इसमें देश के आम नागारिकों की जिम्मेदारी सरकार से ज्यादा बड़ी हो जाती है। हम अपनी जिम्मेदारी तो सही तरह से निभाएं।
आगरा से अनुपमा अग्रवाल