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सुर के शून्य और गूंज में...

Sun, 06 Mar 2016 06:39 PM IST
मंजरी सिन्हा

सार

  • पाणिनी के सूत्र “आदिरन्त्येन समेताः” के अनुसार यदि आदि और अंत भला हो तो पूरी बात बन जाती है।
  • अतः इस सुरीली शुरुआत और गौरव मजूमदार के प्रभावी सितार-वादन से समापन ने पूरे समारोह को स्तरीयता की गरिमा दी।
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विस्तार
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साज बजे। सुर सजे। अलाप का घर बसा। पैरों ने कविता कही। देखते-देखते लोगों को लगने लगा कि जैसे यह संसार एक अनथक गान है...और यह सब महान सितार वादक पं. रविशंकर और उनके शिष्य मित्र ‘बीटल्स’ गायक जॉर्ज हैरिसन की याद में था।
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पं रविशंकर की 96वीं और उनके मित्र और शिष्य सुविख्यात ‘बीटल्स’ गायक जॉर्ज हैरिसन की 73वीं जयंती के उपलक्ष्य में नई दिल्ली के रविशंकर सेंटर ने गत चार से सात फरवरी तक शास्त्रीय संगीत का एक ऐसा उत्सव आयोजित किया, जिसमें संगीत के तीनों ही पक्ष गायन, वादन और नृत्य समाहित थे। स्वर्णिम गोसाईं और इन्द्राणी मुखर्जी के हिंदुस्तानी और सुधा रघुरामन के कर्नाटक शास्त्रीय गायन, अनुपमा भागवत और गौरव मजूमदार के सितार और अभिषेक लाहिड़ी के सरोद वादन, विदुषी सोनल मानसिंह की नाट्य कथा-‘कृष्ण’ तथा विधा व अभिमन्यु लाल के कथक नृत्य की इस त्रिवेणी ने इस संगीतोत्सव को संपूर्ण बनाया।

पं. रविशंकर जितने सुविख्यात सितारवादक थे, उतने ही बड़े संगीत-संयोजक भी। अतः समारोह का शुभारंभ उनकी ही रचना से होना सर्वथा सुनिशि्चत था, लेकिन जिस बात ने प्रभावित किया वह थी सेंटर के किशोर विद्यार्थियों द्वारा उसकी सुरीली प्रस्तुति! ‘चान्ट्स ऑफ इंडिया’ से ली गई गणेश, सरस्वती और गुरु वंदना के संस्कृत श्लोकों का विशुद्ध उच्चारण, एक साथ तीन-तीन स्वरों की हार्मोनी के चुनौती भरे स्वर-संयोजन का सटीक संतुलन बनाए रखते हुए पूरी तरह सुर में गायन और उनमंे भी देवज्योति बोस और राधिका सैम्सन का सितार तथा रमणन वेंकटरमण का हंसवीणा बजाते हुए गाना काबिले तारीफ था। प्रवर टंडन की बांसुरी के मधुर स्पर्श वंदना ही नहीं वातावरण में भी भक्ति की सुवास भर रहे थे।
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पाणिनी के सूत्र “आदिरन्त्येन समेताः” के अनुसार यदि आदि और अंत भला हो तो पूरी बात बन जाती है। अतः इस सुरीली शुरुआत और गौरव मजूमदार के प्रभावी सितार-वादन से समापन ने पूरे समारोह को स्तरीयता की गरिमा दी। गौरव पं. रविशंकर के शिष्य और मैहर घराने के युवा सितारवादक हैं। राग श्याम कल्याण में विधिवत आलाप-जोड़ झाले सहित उन्होंने तीन ताल में विलम्बित और द्रुत गत के बाद एक द्रुत गत राग सरस्वती में बजाते हुए पीलू में धुन से अपना कार्यक्रम और यह चतुर्दिवसीय समारोह संपन्न किया।

तबले पर उस्ताद अकरम खां और उनके बारह-वर्षीय सुपुत्र जरगाम ने उनका बराबरी से साथ दिया। कोलकाता के विख्यात गुरुकुल आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी में पं. अरुण भादुड़ी के शिषत्व में तराशी तथा पं.रामाश्रय झा तथा विदुषी पूर्णिमा चौधरी जैसे गुरुओं का मार्गदर्शन पा चुकी इन्द्राणी मुखर्जी का सुमधुर गायन, कोलकाता के ही अभिषेक लाहिड़ी का सरोद तथा बंगलुरू की अनुपमा भागवत का सुरीला सितार वादन दिल्ली के संगीत प्रेमियों के लिए सुरीला तोहफा था।

विदुषी किशोरी अमोनकर की शिष्या जयपुर अतरौली घराने की युवा गायिका स्वर्णिम गोसाईं ने यद्यपि जैत कल्याण में विलम्बित और मध्य लय खयाल और ठुमरी खमाज के बाद मीरा के भजन गाकर अनुपमा के लिए समय कम छोड़ा था। विदुषी सोनल मानसिंह की कृष्ण पर केंद्रित मनमोहक नाट्य-कथा, विधा और अभिमन्यु लाल के कमनीय कथक के अलावा इन्द्राणी का गाया राग पूरिया में खयाल और काफी टप्पा, अभिषेक लाहिड़ी का सरोद पर बजाया यमन, इमदादखानी घराने की युवा सितार वादिका अनुपमा का रागेश्री और पीलू धुन तथा सुधा रघुरामन का कर्नाटक शास्त्रीय गायन समारोह को यादगार बना गया।
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