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मंजिलें और भी हैं : कैंसर पीड़ित बच्चों को हंसाने का काम करता हूं

Fri, 17 May 2019 03:22 PM IST
अमर शर्मा प्रवीण तुलपुले
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प्रवीण तुलपुले - फोटो : Amar Ujala
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मेरा स्वभाव बचपन से ही हंसी-मजाक वाला है। जब मैं 13-14 साल का था, तभी से मैंने जादू दिखाना शुरू किया। तब यह सब शौकिया तौर पर चल रहा था। मुझे अंदाजा भी नहीं था कि एक दिन इसे पेशेवर तरीके से आयोजित करूंगा, ताकि कैंसर पीड़ित बच्चों के चेहरों पर मुस्कान ला सकूं। पढ़ाई खत्म करने के बाद मुझे नौसेना में अफसर कैडेट के रूप में तैनाती मिली। मेरे काम के लिए मुझे 1983 में राष्ट्रपति स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। 
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इन सबके बीच जादू दिखाने की ललक मेरे मन में मौजूद रही। नौसेना के कार्यक्रमों में, सहकर्मियों की पार्टियों में, दोस्तों के घर विभिन्न मौकों पर मैं शौकिया तौर पर कार्यक्रम करता रहा। पर इसे लेकर गंभीर नहीं था। फिर मेरी पोस्टिंग मुंबई हुई, जहां मेरी मुलाकात कई पेशेवर जादूगरों से हुई। तब मुझे लगा कि जादू सिर्फ लोगों को चौंकाना नहीं, बल्कि उनके चेहरों पर मुस्कान लाना और खेल-खेल में कुछ सिखाना भी है। 

एक दिन मेरे दोस्त ने कहा कि बच्चों की एक पार्टी है, वहां जोकर बनकर आ जाना। जोकर बनकर जब मैं वहां गया, तो पता चला कि वे कैंसर पीड़ित बच्चे हैं। उनमें कोई व्हीलचेयर पर था, किसी के चेहरे पर मास्क लगा था, तो किसी के बाल बिल्कुल गायब थे। उन्हें शायद पता भी नहीं था कि उन्हें क्या हुआ है। उनमें सामान्य बच्चों की तरह जीने की ललक थी। उन्हीं में से एक बच्चा पूरे समय मेरे आगे-पीछे घूमता रहा। मैंने उसे अपना खेल दिखाया, उसने मेरे साथ फोटो भी खिंचाई। उसके साथ मेरी फोटो एक अखबार में भी छपी। पर कुछ दिनों बाद पता चला कि वह बच्चा नहीं रहा। 
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उस घटना से मेरे दिल पर चोट लगी, पर यह जानकर तसल्ली मिली कि मैंने उसकी जिंदगी की एक बड़ी इच्छा पूरी कर दी। दरअसल वह बच्चा जोकर से मिलना चाहता था। उस दिन के बाद मैंने अपने जोकर वाले रूप का नाम ‘हैप्पी द क्लाउन’ रख लिया और तब से मेरा एक ही मकसद बन गया कि लोगों में खुशियां बांटनी है। मेरी नौकरी अच्छी चल रही थी। पर उस घटना के बाद जादू और जोकर को लेकर मेरा जुनून इतना बढ़ा कि मैंने नौकरी छोड़ दी। नौसेना में पेंशन के लिए जितने साल चाहिए होते हैं, उतने अभी पूरे नहीं हुए थे। इसलिए मुझे पेंशन भी नहीं मिलती। इसको लेकर मुझ पर सबने तंज कसे, कुछ ने मुझे पागल कहा, तो कइयों ने बेवकूफ समझा। 

इस कदम के बाद मेरा परिवार बेहद कठिन दौर से गुजरा, पर वक्त के साथ सब कुछ व्यवस्थित होता चला गया। अब मैं पेशेवर जादूगर की तरह कार्यक्रम करता हूं। अन्य शहरों में भी बुलाने पर जाता हूं। इसके साथ ही कई गैर-सरकारी संगठनों के लिए मुफ्त में कार्यक्रम करता हूं। कैंसर पीड़ित बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए मैं नियमित मुंबई के टाटा मेमोरियल, वाडिया और केईएम अस्पतालों में जाता रहता हूं। इसके साथ ही ‘मिलाप’ नाम की एक वेबसाइट के साथ मिलकर क्राउड फंडिंग के जरिये बच्चों के इलाज के लिए मैं पैसे भी जुटाता हूं। मेरे प्रयासों से अब तक दो लाख रुपये की मदद आ चुकी है। मुझसे जितना हो सकता है, कैंसर से जूझ रहे बच्चों के इलाज में मदद करने के साथ, उनके चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश करता हूं। मुझे लगता है कि यह काम करते हुए मैंने अपने जीवन का सही रास्ता ढूंढ लिया है।
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