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मंजिलें और भी हैं : आंखों की रोशनी चली गई फिर भी आईएएस बनी

Tue, 30 Jul 2019 04:52 AM IST
प्रांजल पाटिल प्रांजल पाटिल
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प्रांजल पाटिल - फोटो : अमर उजाला
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मैं महाराष्ट्र में मुंबई के उल्हासनगर से ताल्लुक रखती हूं। मेरे पिता सरकारी कर्मचारी हैं, जबकि मां गृहिणी है। मैं बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई के मामले में तेज थी। तब मैं छह साल की थी, जब स्कूल में मामूली-सी लड़ाई में एक सहपाठी ने मेरी एक आंख पर पेंसिल मार दी। रेटिनल डिटेचमेंट के कारण मेरी बाईं आंख की रोशनी चली गई। 
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पापा मुझे डॉक्टर के पास ले गए। इलाज होने के बाद मैं घर आ गई। बावजूद इसके डॉक्टरों ने पापा को बताया था कि मेरी दूसरी आंख की रोशनी भी जा सकती है। दुर्भाग्य से डॉक्टरों की चेतावनी सही साबित हुई और एक साल के भीतर ही मैंने अपनी दूसरी आंख की रोशनी भी खो दी।

इस घटना के बाद भी मेरे माता-पिता ने मुझे पढ़ने से नहीं रोका। मेरी शुरुआती पढ़ाई मुंबई के दादर स्थित कमला मेहता स्कूल फॉर ब्लाइंड से हुई। मैं हर रोज उल्हासनगर से सीएसटी जाया करती थी। सभी लोग मेरी मदद करते थे, कभी सड़क पार करने में, कभी ट्रेन में चढ़ने में। 
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कुछ लोग कहते थे कि मुझे उल्हासनगर के ही किसी कॉलेज में पढ़ना चाहिए, पर मैं उनको सिर्फ इतना कहती कि मुझे इसी कॉलेज में पढ़ना है और मुझे हर रोज आने-जाने में कोई परेशानी नहीं है। वहां से मैंने 10वीं और 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। 12वीं कक्षा में मैंने चांदीबाई कॉलेज में कला संकाय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके बाद सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई से राजनीति विज्ञान में स्नातक किया। 
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बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। स्नातक की पढ़ाई के दौरान मुझे एक दोस्त ने सिविल सेवा के बारे में बताया। धीरे-धीरे मैं यूपीएससी परीक्षा की जानकारी हासिल करने लगी। मैं आईएएस बनने का सपना देखनी लगी। स्नातकोत्तर के बाद एमफिल करने के दौरान मैंने यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी। मेरे इस सफर में तकनीक ने मेरा बहुत साथ दिया। 

तैयारी के दौरान मुझे पता चला कि जॉब एक्सेस विद स्पीच (जेएडब्ल्यूएस) नाम का एक स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर खास तौर से नेत्रहीन व न सुन पाने वाले लोगों के लिए बनाया गया है। मैंने उसे डाउनलोड किया, पर यह बहुत लंबी प्रक्रिया थी। मैं पहले किताब लेकर उसे स्कैन करती, क्योंकि जेएडब्ल्यूएस पर मैं सिर्फ प्रिंटेड किताबें ही पढ़ सकती थी। इसी के चलते अपने हाथ से लिखे गए नोट्स  पढ़ना भी मुश्किल था। ऐसे में मुझे कोई ऐसा लिखने वाला व्यक्ति ढूंढना था, जो मेरी गति के हिसाब से लिख पाए। इसके लिए मेरी दोस्त विदुषी ने सहायता की। अगर मैं एग्जाम के दौरान कभी धीरे हो जाती तो विदुषी मुझे डांटती थी। 

यह ऐसा था कि मैं शब्द बोलती और वह पेपर पर होता था। वर्ष 2016 में मैंने यूपीएससी की परीक्षा 773 वीं रैंक के साथ पास की। उस समय मुझे भारतीय रेलवे लेखा सेवा (आईआरएएस) में नौकरी आवंटित की गई थी। पर ट्रेनिंग के समय रेलवे मंत्रालय ने मेरी सौ फीसदी नेत्रहीनता को आधार बनाकर नौकरी देने से इनकार कर दिया। मैंने वर्ष 2017 में फिर से यूपीएससी परीक्षा 124वीं रैंक के साथ पास की, जिसके साथ मेरा आईएएस बनने का सपना पूरा हो गया। 

पढ़ाई कभी भी मेरे लिए मुश्किल नहीं रही, बल्कि मुझे नया पढ़ना और सीखना पसंद है। मैंने कोचिंग नहीं ली, पर टेस्ट सीरीज का सहारा लिया। बेशक मैं आंखों की रोशनी न होने के चलते इस दुनिया के रंगों को देख नहीं सकती हूं, पर महसूस करती हूं। जो भी कड़ी मेहनत करने और सपने देखने के लिए तैयार हैं, मैं उन सबका समर्थन करुंगी। मैं सबको सपने देखने के लिए प्रोत्साहित करुंगी।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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