मैं राजस्थान के नागौर जिले का रहने वाला हूं। मेरा जिला पानी की उपलब्धता के हिसाब से डार्क जोन माना जाता है। बचपन में खेती-किसानी की तमाम कठिनाइयों से निबटने के स्थानीय उपायों को देखते हुए मैंने गांव के ही स्कूल में छठी कक्षा तक पढ़ाई की। उसके बाद खेती-किसानी के चलते स्कूल छोड़ना पड़ा। इस दौरान स्थानीय ट्रैक्टर मालिकों को समय-समय पर जरूरत अनुसार पुर्जे खोलने एवं मरम्मत में सहायता देने लगा। इससे मुझे आस-पास के इलाके में कुशल मिस्त्री के रूप में पहचान मिली।
खेती और पर्यावरण संरक्षण की प्राथमिक शिक्षा मुझे अपनी दादी से मिली। दादी ने गांव में मुझसे पीपल का एक पौधा लगवाया। 15 वर्ष बाद जब उस पौधे को मैंने विशाल पेड़ के रूप में देखा, तो बहुत खुशी मिली। उन्हीं की प्रेरणा से मैंने नागौर, बाड़मेर, जैसलमेर व बीकानेर समेत कई जगहों पर लगभग तीन लाख पौधे लगाए, जिसमें वन विभाग व सरकार के आकलन के मुताबिक सवा दो लाख पौधे अब पेड़ बन चुके हैं। साथ ही एक सूखाग्रस्त गांव हरिमा में कर्ज लेकर चौंतीस बीघा जमीन खरीदी और उसमें खेती करने के साथ-साथ सोलह हजार से भी ज्यादा पौधे लगाए।
मैंने छह बीघा के एक दूसरे खेत में खेजड़ी और देशी बबूल के करीब चार सौ पौधे, जो अब पेड़ बन चुके हैं, बिना किसी अतिरिक्त खर्चे के बरसाती पानी से उगाए हैं। खेजड़ी थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों पर पाया जाता है। यह मरूधरा की जीवन रेखा है। अंग्रेजी में इसे प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है। यह जेष्ठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता, तब यह पेड़ छाया देता है।
मैंने जब खेत खरीदा, तब खेजड़ी के मात्र चौदह पेड़ थे। आज दो हजार से भी ज्यादा पेड़ हैं, क्योंकि खेजड़ी पर जलवायु-परिवर्तन का दुष्प्रभाव कम होता है। पश्चिमी सभ्यता की अंधी दौड़ में हमारे किसान भी पिस रहे हैं। धरती की कोख से पानी खींचने की मशीनें तो खूब हैं, लेकिन ऊपर आसमान से पानी बरसाने वाली मशीनें नहीं हैं। इस काम को तो पेड़ ही बखूबी अंजाम देते हैं।
पानी की कमी के चलते अक्सर सैकड़ों पक्षी खेतों के आस-पास मंडराते रहते हैं, ताकि फसलों को दिए जा रहे पानी से वह अपनी प्यास बुझा सकें। इसके लिए मैंने अपने खेत में पेड़ों पर जगह-जगह मिट्टी के परिंडे (चौड़े बर्तन) लटकाकर रखे हैं। यहां आकर पक्षी अपनी प्यास बुझाते हैं, साथ ही फसलों के लिए हानिकारक कीड़ों-मकोड़ों को भी खा जाते हैं। खेतों में पेड़-पौधे होने की वजह से लगभग तीन सौ से ज्यादा मोरों ने यहां अपना बसेरा बनाया है।
वर्ष 1986 में मैं जापान सरकार की सहायता से संचालित परियोजना के अंतर्गत वन विभाग से जुड़ा, इसके बाद से वन और पर्यावरण संरक्षण के लिए पूरी तरह काम करना शुरू कर दिया। साथ ही सामाजिक बुराइयों को दूर करने की दिशा में काम करते हुए मैंने नशे के विरुद्ध अभियान चलाया, जिससे प्रेरित होकर सैकड़ों लोगों ने नशा छोड़ा।
वन्य जीव संरक्षण के लिए शिकारियों से कानूनी लड़ाई लड़ते हुए मैंने अपने खर्चे पर 28 मुकदमें दायर किए, जिनमें 16 शिकारियों को जेल हो चुकी है। इन कामों के लिए मैंने कभी कोई अनुदान नहीं लिया। पेड़-पौधे ही मेरे जीवन का आधार हैं। मेरे रग-रग में वन, वन्यजीव व पर्यावरण को संरक्षित करने का जज्बा भरा है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।