दिमाग में जो चित्र होते हैं, वे उन्हें एकजुट करते हैं, उनका संपादन करते हैं, और फिर उन्हें शब्दों में बदल देते हैं। अगर दृष्टिबाधित लेखकों की कल्पना शक्ति प्रबल हो, तो वे घने कोहरे और घनी कालिमा में भी स्पष्टता और रंग ढूंढ पाते हैं। जॉन मिल्टन, जॉर्ज लुई बोर्खेज और दर्जनों कम लोकप्रिय लेखकों का महत्व इसी कारण है कि उन्होंने जवानी में अपनी आंखें खो दी थीं।
उन्हें सहायता की जरूरत थी, लेकिन वे लिखते चले गए। उन्होंने एक ऐसी दुनिया के लिए लिखा, जो दिव्यांगों को अक्सर कमतर करके आंकती है और अपनी प्रतिक्रियाओं के जरिये बताती है कि वैसे लोगों पर उसने कितनी कृपा की।
महाकवि मिल्टन ने 1652 में अपनी आंखें खोने के लगभग एक दशक बाद पैराडाइज लॉस्ट और पैराडाइज रिगेन्ड जैसी विलक्षण कृतियों की रचना की। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि उन्होंने अंधे होने के बावजूद नहीं, बल्कि अंधे होने के कारण ही ऐसी कालजयी रचनाएं कीं। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में मिल्टन पढ़ाने वाले जॉन रमरिक कहते हैं, मिल्टन ने अपने अंधेपन को अपनी गहरी अंतदृष्टि की कीमत के रूप में देखा। भीतरी आंखों के होते हुए बाहरी आंखों की जरूरत नहीं रह गई थी। और इसी बोध ने मिल्टन को अपनी इन दो कृतियों की रचना के लिए और भी प्रेरित किया।
अर्जेंटीना के चर्चित औपन्यासिक, कवि और निबंध लेखक बोर्खेज ने 1977 में जब अपने एक लेख में यह लिखा कि 'एक लेखक को यह मानना ही चाहिए कि उसके साथ जो कुछ घटित होता है, वह एक वरदान है', तो उनके दिमाग में मिल्टन था। अपने लेख में उन्होंने आगे लिखा, 'अपमान, शर्म, विपत्ति-ये सब कुछ मिट्टी की तरह, वस्तुओं की तरह हैं। अगर एक दृष्टिबाधित आदमी इस तरह सोचता है, तो वह बच जाता है। आंख न होना एक उपहार है।' आंखों की कमी को बोर्खेज ने ऑन हिज ब्लाइंडनेस जैसी एक शानदार कविता में तब्दील किया।
होमर को भी दृष्टिबाधित बताया जाता है, हालांकि इस बारे में ठीक-ठीक कुछ कह पाना कठिन है। साहित्य के विशेषज्ञ अभी तक यही तय नहीं कर पाए हैं कि इलियड के रचयिता होमर एक कवि थे या इस नाम के कई कवि थे। लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी की लेक्चरार हीदर टिले ने ब्लाइंडनेस ऐंड राइटिंग : फ्रॉम वर्ड्सवर्थ टू गिसिंग नाम की एक किताब लिखी है, जिसमें विक्टोरियन युग के कई दृष्टिबाधित लेखकों का जिक्र है।
मैंने बर्केट से पूछा कि आंखों की कमी ने उनके लेखन पर कितना असर डाला है। उनका कहना था कि आंखें न रहने से उनकी स्मृति ज्यादा प्रखर हुई है, पात्रों के शारीरिक ब्योरों को वह ज्यादा विस्तार दे पाते हैं, 'और इस शारीरिक कमी ने मुझे ज्यादा धैर्यवान, ज्यादा दयालु और पहले से अधिक समझदार बनाया है। सहानुभूतिशील तो मैं पहले भी थी, लेकिन अब मुझमें समानुभूति भी है।'
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