मैंने अपने बचपन में ही पिता को खो दिया। मेरी मां शिक्षिका थीं। मैं आज जो भी हूं, उन्हीं की वजह से हूं। मैंने देखा है कि हमें पालने के लिए मेरी मां ने कितना संघर्ष और कितना आत्मत्याग किया। मेरा जीवन और मेरी कविताएं मां के प्रति कृतज्ञता से भरी हैं।
मैं मेरे अग्रज कवि जीवनानंद दास के इस कथन से सहमत हूं कि सभी कवि नहीं होते, कुछ-कुछ लोग कवि होते हैं। जीवनानंद दास की मृत्यु मेरे पैदा होने के अट्ठारह दिन पहले हो गई थी। उनके जीवनकाल में उन्हें जीवन विरोधी कवि तक कहा गया। लेकिन उनकी मृत्यु के चालीस साल बाद उनकी एक-एक कविता पंक्ति को महत्व मिला। हम कवियों को उनसे सीखना चाहिए। लेकिन हम नहीं सीखते। हम आज लिखते हैं, और आज ही हमें पहचान और सम्मान चाहिए।
मेरे अंदर भी यह प्रवृत्ति है। बहुत कम उम्र में मैंने अपनी कविताओं के कुछ प्रशंसक पाए। कुछ हमउम्र कवियों को मेरी कविताएं पसंद थीं। मैं एक बार दुर्गापूजा में अमेरिका गया, तो वहां अनेक लोगों ने कहा कि उन्होंने मेरी कविताएं पढ़ रखी हैं। हालांकि मैं अभी तक कविता में अपनी भाषा ढूंढ नहीं पाया हूं। मैं आदमी के तौर पर विफल हूं। चूंकि मैं अपने जीवन के आधार पर कविता लिखता हूं, इसलिए मेरे जीवन की गलतियां कविताओं में चली आती हैं।
कविता में होने वाली गलतियों को तो काटकर ठीक किया जा सकता है, लेकिन जीवन की गलतियों को ठीक नहीं किया जा सकता। मुझमें कालजयी कविताएं लिखने की महत्वाकांक्षाएं नहीं हैं। मैं बस इतना चाहता हूं कि बीच-बीच में अपने जीवन को कविता में उतार सकूं।
-मूर्तिदेवी पुरस्कार से सम्मानित बांग्ला कवि