पिछले दिनों राहुल गांधी को कांग्रेस का निर्विरोध राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। इससे पहले उनकी मां सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर करीबन 19 साल विराजमान रहीं। हां, यह जरूर है कि नेहरू-गांधी परिवार आजादी से लेकर अब तक सत्ता के शीर्ष केंद्र के आस-पास रहा है, परंतु यह परिवारवाद आज भारत में अन्य कई पार्टियां में भी है।
भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण तथा पूर्व से लेकर पश्चिम तक भारतीय लोकतंत्र परिवारवाद का दंश झेल रहा है। जिसके के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं, जम्मू में आज पीडीपी गठबंधन की सरकार है तथा विपक्ष में नेशनल कॉन्फ्रेंस है, जो दोनों ही पारिवारिक पार्टी हैं और दोनों के ही मुखिया दो मुख्य परिवार से आते हैं।
पंजाब में अकाली दल और राजस्थान में भी स्थिति वैसी ही है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में राजद, लोक-जनशक्ति पार्टी, उड़ीसा में बीजेडी, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, महाराष्ट्र हर राज्य में लगभग यही स्थिति है।
इस परिवारवाद से कुछ हद तक बीजेपी भी आज अछूती नहीं रही है। आज भारतीय लोकतंत्र में परिवारवाद बढ़ता ही जा रहा है, जो लोकतंत्र के हित में कतई शुभ नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र की गरिमा बनी रहे, इसलिए राजनीति में परिवारवाद पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।
धर्मशाला से पुष्पांकर पीयूष