मैंने यह खेल इसकी तेज गति, ताकत और खून के बहाव को तेज करने के लिए चुना है। जब रग्बी गेंद आपके हाथों में होती है और आप गोल की ओर दौड़ते हो, तो वह गजब की अनुभूति है। मैं कश्मीर की रहने वाली हूं। मेरा खेलना परिवार में किसी को अच्छा नहीं लगता था। जब मैं हायर सेकंडरी मैं थी, तो घर वालों से छिपकर स्कूल में फुटबॉल खेलती थी। बाद में मेरे खेल शिक्षक ने मुझसे रग्बी में हिस्सा लेने को कहा।
मुझे रग्बी के बारे में कुछ पता नहीं था। पर उनके कहने पर मैंने खेलना शुरू किया। स्कूल स्तर पर और फिर जिला स्तर पर स्वर्ण पदक जीता। लेकिन जब राष्ट्रीय टीम के लिए चयन हुआ, तो घर वालों ने बाहर भेजने से मना कर दिया। हलांकि बाद में मेरे चाचा ने उन्हें समझाया तो किसी तरह वे सहमत हुए।
मेरे पिता भी मेरे खेल के खिलाफ थे, हालांकि वह जब-जब टीवी या पत्र-पत्रिकाओं में मेरी तस्वीरें देखते तो खुश हो जाते थे। एक बार खेल के दौरान मेरी नाक टूट गई। परिवार के लोगों ने मेरे खेल का विरोध जोरदार तरीके से किया। परिचित तो यहां तक कहने लगे कि, अब तो इस लड़की से कोई शादी भी नहीं करेगा। उनके ताने सुनकर मैं मानसिक तनाव में चली गई। तब पापा ने मुझे संभाल लिया। एक बार तो मेरे सीनियर ही मेरी इज्जत पर सवाल उठाने लगे।
धमका कर मुझसे रिजाइन ले लिया गया। मैं छह महीने तक तनाव में रही, लेकिन तब तक मेरे पापा मेरे समर्थन में आ गए, वह मुझे प्रोत्साहित करते रहे। जल्द ही मैंने वापसी की, और अकेले ही रग्बी लड़कियों की कोचिंग करने लगी। मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है कि खेल में भी लैंगिक अनुपात को प्राथमिकता दी जाए। इससे सामूहिक स्तर पर खेल का ही नुकसान होता है।
ऐसा भी हो सकता है कि एक लड़के की तुलना में कोई लड़की ज्यादा बेहतर टीम की कप्तान साबित हो, तो उसे ही अवसर दिया जाना चाहिए। ऐसा तभी संभव हो सकता है, जब लैंगिक स्तर पर समान टीम हो यानी लड़के और लड़कियां एक साथ। ट्रेडिशनल टीम उसी पुराने खांचें में दर्शकों के लिए भी उबाऊ हो चुकी हैं। ट्रेंड बदले, नए फॉर्मूले में टीमों का गठन हो, तो हमारे नए-पुराने सभी खेल और भी ज्यादा रोमांचक हो सकते हैं। मेरे खेल के चलते ही मुझे जम्मू-कश्मीर की सबसे कम उम्र की रग्बी विकास अधिकारी (आरडीओ) बनाया गया है।
मुझे भी उसी तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, जैसे की अन्य कश्मीरी लड़कियों को करना पड़ता है। मेरे पास खेल के सभी संसाधन मौजूद नहीं हैं। पिछले वर्ष दिसंबर में गवर्नर के सलाहकार ने रग्बी के कुछ उपकरण दिलाने की मंजूरी दी थी पर वे अभी तक मिले नहीं हैं।
बावजूद इसके, अब तक स्कूल-कॉलेजों के सैकड़ों बच्चों को मैं प्रशिक्षित कर चुकी हूं। अभी लगभग पचास कश्मीरी लड़कियां रग्बी सीख रही हैं। मैं चाहती हूं कि ये लड़कियां राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रग्बी खेलें। कश्मीर घाटी में खिलाड़ी लड़कियों के लिए पहली मुश्किल परिवार की सरहदें लांघना होती है।
इसके बाद परिचित व रिश्तेदार शादी-ब्याह के ताने मारते हुए रुकावट बनते हैं। मैंने इनको झेला है, मानसिक तनाव में भी रही हूं, पर कभी हार नहीं मानी। अब मेरे खेल को मेरा परिवार सहयोग करता है। हर तरह के खेल के लिए कश्मीर में प्रतिभाएं मौजूद हैं। यहां की लड़कियां चाहती हैं कि वह विभिन्न खेलों का हिस्सा बनें, लेकिन सामाजिक रूढ़ियों, पारिवारिक बंधनों व रिश्तेदारों के तानों के चलते उन्हें मौका नहीं मिल पा रहा है। इन लड़कियों को जम्मू-कश्मीर खेल परिषद से बड़ी उम्मीदें हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।