लिखते हुए ऐन उस वक्त रुकना चाहिए, जब तुम रौ में होओ और तुम्हें यह पता हो कि आगे क्या लिखना है... इसके बारे में अगले दिन लिखने से पहले सोचना या चिंता करना छोड़ दो। ऐसा करने से तुम्हारा अवचेतन अपने आप इस पर काम करता रहेगा कि क्या लिखना है। लेकिन अगर तुम सचेत होकर इस बारे में सोचने लगोगे, तो निश्चय ही उसे नष्ट कर दोगे, जो कागज पर उतरने के लिए तुम्हारे भीतर घुमड़ रहा है और तुम्हारा दिमाग ऐसा करते हुए इस कदर थक जाएगा कि तुम अगले दिन लिखना शुरू नहीं कर पाओगे।
विराम की घड़ी में जब भी तुम्हारा मन उस ओर जाए, उसे रोको, कहीं और लगाओ। यह तुम्हें रोज जतन से सीखना होगा। वह कुआं, जो मेरे लेखन का जल-स्रोत है, उसे मैंने इसी तरह कभी सूखने नहीं दिया। तुम मुख्यतः दो लोगों के लिए लिखते हो-खुद के लिए, ताकि पूर्णता या अचरज के अहसास से भरे रहो और उसके लिए, जिससे तुम्हें प्यार है। अपनी निजी त्रासदी को भुलाओ।
ऐसा सबके साथ होता है और तुम्हे गंभीरता से लिखने के लिए बुरे से बुरा का भुक्तभोगी बनना ही होगा। इतना जरूर ख्याल रहे कि जब तुम बुरी तरह आहत हो जाओ, तो वह अनुभव किसी तरह जाया न हो। एक लेखक की पहली सबसे अच्छी ट्रेनिंग उसका बचपन होती है : उदास बचपन। अच्छे लेखन को तुम कितनी ही दफा क्यों न पढ़ जाओ, यह बताना हमेशा कठिन होगा कि वह कैसे लिखा गया होगा।
हर महान लेखन में रहस्य का एक तीर बिंधा है, तुम जितनी दफा उसे पढ़ोगे, कुछ नया सीख सकोगे। एक अच्छा लेखक अपने अनुभवों से जितना सीखता है, अपनी कल्पनाओं में उतना ही सच्चा होता है। मनुष्यों के बारे में खरी ईमानदारी से लिखना कठिन है। इसके लिए सबसे पहले तुम्हें अपने विषयवस्तु को जानना होगा और फिर यह कि इसे लिखा कैसे जाए। मेरे ख्याल में दोनों को जानने में एक पूरा जीवन निकल जाता है।
-मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार