लाखों साल पहले हमारे पुरखे मामूली जानवर थे। प्रागैतिहासिक इंसानों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात हम यही जानते हैं कि वे जरा भी महत्वपूर्ण नहीं थे। धरती में उनकी हैसियत एक जैली फिश या जुगनू या कठफोड़वे से ज्यादा नहीं थी। इसके विपरीत, आज हम इस ग्रह पर राज करते हैं। सवाल उठता है: वहां से यहां तक हम कैसे पहुंच गए?
मनुष्य और अन्य सभी जानवरों के बीच वास्तविक अंतर व्यक्तिगत स्तर पर नहीं होता; दरअसल यह अंतर सामूहिक स्तर पर होता है, इंसान पृथ्वी पर इसलिए राज कर पाते हैं, क्योंकि वे अकेले ऐसे जानवर हैं, जो बड़े लचीलेपन से और बहुत बड़ी संख्या में सहयोगपूर्ण व्यवहार कर पाने में सक्षम हैं।
हां, कुछ और जीव भी हैं - जैसे सामाजिक कीट, मधुमक्खियां, चीटियां - ये भी बहुत बड़ी संख्या में सहयोगपूर्ण व्यवहार करते हैं, लेकिन उनके सहयोग में लचीलापन नहीं होता। वे अत्यंत अनम्य तरीके से सहयोग करती हैं। हर कोई ईश्वर पर विश्वास नहीं करता। न ही हर आदमी मानवाधिकारों पर विश्वास करता है। राष्ट्रवाद पर भी हर किसी को यकीन नहीं। लेकिन नोटों की शक्ल में पैसे पर हर कोई यकीन करता है। हम मनुष्य धरती पर इसलिए राज कर पाते हैं, क्योंकि हम दोहरी वास्तविकता में जीते हैं।
शेष सभी जीव वस्तुगत यथार्थ में जीते हैं। उनके यथार्थ में वस्तुगत चीजें शामिल हैं, जैसे- नदी, पेड़, शेर और हाथी। हम इंसान भी वस्तुगत यथार्थ में जीते हैं। हमारी दुनिया में भी नदियां हैं, पेड़ हैं और शेर-हाथी वगैरह हैं। लेकिन सदियों से हमने अपने वस्तुगत यथार्थ के ऊपर मनोगत यथार्थ की एक और परत चढ़ा दी है।
यह यथार्थ कल्पना से उपजी चीजों से बना है, जैसे- राष्ट्र, ईश्वर, पैसा और कॉरपोरेशन। हैरानी की बात है कि जैसे-जैसे इतिहास आगे बढ़ा, मनोगत यथार्थ और मजबूत होता चला गया। आज दुनिया की सबसे बड़ी शक्तियों में यही काल्पनिक वस्तुएं हमारे सामने हैं।
-इस्राइली इतिहासकार और दार्शनिक