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अंतर्ध्वनि: हर आदमी वही देखता है, जो उसके हृदय के पास होता है

Fri, 06 Sep 2019 02:10 AM IST
Nilesh Kumar नामवर सिंह
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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जब कोई किसी कविता की गलत व्याख्या करे, तो उसे जोर से पढ़वाकर सुनिए। गलती पकड़ में आ जाएगी। किसी रचना में पकड़ने की असल चीज है 'स्वर'! इस स्वर में लेखक की खामोशियां भी शामिल हैं; बल्कि ये 'खामोशियां' ज्यादा मानीखेज होती हैं। 
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घनानंद की 'मौन मधि पुकार' और क्या है? आनंदवर्धन की घंटे-सी गूंजती हुई 'ध्वनि' का अर्थ और क्या है? कोई रचना अच्छी लगे, लेकिन ठीक-ठीक वजह का पता न चल पाए, तो भी आलोचक में यह कहने का साहस होना चाहिए कि रचना अच्छी है। 

आलोचना में पहचान का भी महत्व है। आलोचना जैसी कोई निरपेक्ष वस्तु नहीं होती, सिर्फ आलोचक होते हैं-अच्छे या बुरे। आलोचना औजारों का बक्सा नहीं, जिसे पाकर कोई आलोचक बन जाए। अक्ल हो तो एक पेचकस ही काफी है! कवि अपने बारे में कहे, तो कविता हो सकती है, पर आलोचना तो तभी होती है, जब रचना के बारे में कहा जाए।
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आलोचक को अपने बारे में कहने की छूट नहीं है। आलोचना के बारे में भी आलोचना हो सकती है, ठीक उसी तरह जैसे कविता के बारे में कविता। आत्मरति के खतरे कहां नहीं हैं? सार्थक उत्तर अपने ही प्रश्नों के होते हैं, लेकिन इसका अर्थ वही समझ सकते हैं, जिनके पास अपने प्रश्न हों...।
 
गेटे ने कितना सही कहा था कि हम सचमुच उन्हीं पुस्तकों से सीखते हैं, जिनकी आलोचना नहीं कर सकते। अभागे आलोचक के भाग्य में ऐसी पुस्तकें कितनी होती हैं? मैक्स वेबर अक्सर कहा करते थे  'हर आदमी वही देखता है, जो उसके हृदय  के पास होता है।' वे गर्दन झुका सकते थे, निगाहें नीची कर सकते थे। बड़े आलोचकों में कौन है, जिसका कोई 'अंधविंदु' न हो! क्या वह 'अंधविंदु' ही उसकी 'अंतर्दृष्टि' का कारण नहीं? प्रज्ञाचक्षु आलोचक सुख की नींद सो सकते हैं!
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-हिंदी के सुप्रसिद्ध दिवंगत आलोचक।
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