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मंजिलें और भी हैं: आखिरी सांस तक बुजुर्गों का सहारा बनूंगा

Mon, 17 Jun 2019 01:42 AM IST
Avdhesh Kumar डॉक्टर उदय मोदी
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डॉक्टर उदय मोदी - फोटो : अमर उजाला
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मैं मुंबई के भायंदर इलाके में रहता हूं, और पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर हूं। इस पहल की शुरुआत करीब बारह वर्ष पहले हुई। मेरी क्लीनिक पर एक बुजुर्ग इलाज के लिए आए। उनकी हालत खराब थी और देखकर लग रहा था कि कई दिनों से कुछ खाया नहीं है। इलाज करने के बाद मैंने उनके लिए जूस और खाना मंगवाया। मेरे व्यवहार से भावुक होकर वह रोने लगे। पूछने पर बताया कि उनका बेटा उन्हें व उनकी पत्नी को खाना नहीं देता। उनकी पत्नी लकवाग्रस्त हैं इसलिए उन्हें देखभाल के लिए घर पर रहना होता है। पर बेटे-बहू के खराब व्यवहार के कारण उनकी हालत बदतर होती जा रही है।
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बुजुर्ग की बात सुनकर मेरा दिल भर आया। मैंने उनसे कहा कि वे अपना पता दे दें, मेरे घर से हर रोज उनके लिए खाने का डिब्बा आ जाया करेगा। घर आने पर मैंने यह बात पत्नी कल्पना को बताई। वह बोली कि जितने भी लोगों का खाना देना हो, आप बता दें। मैं सुबह बना दिया करूंगी। यह केवल एक बुजुर्ग दंपत्ती की समस्या नहीं होगी, बल्कि मुंबई में ऐसे और भी लोग होंगे। यह बात मेरे दिल में बैठ गई। ऐसे में अन्य जरूरतमंदों तक यह सुविधा पहुंचाने के लिए मैंने बैनर बनवाकर सार्वजनिक स्थलों पर लगवाया। इस तरह पहले कुछ बुजुर्गों ने मुझसे संपर्क किया, लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर दो सौ से ज्यादा हो गई।

मैं हैरान था कि कैसे बच्चे हैं, जो अपने मां-बाप को इस तरह का जीवन जीने पर मजबूर कर सकते हैं। मैंने उनमें से कुछ बुजुर्गों के परिजनों से बात करने की कोशिश भी की, पर उन्होंने कहा, क्या हमने आपको बोला कि आप हमारे मां-बाप के लिए खाना दो, आपको क्या पड़ी इन लोगों की मदद करने की। यह सुनकर मुझे बुरा तो जरूर लगा, पर इन बुजुर्गों के लिए कुछ करने का इरादा और भी पक्का हो गया।
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घर पर इतने सारे लोगों का खाना बनाना थोड़ा मुश्किल था। इसलिए मैंने श्रवण टिफिन सर्विस के नाम से एक किचन शुरू किया। खाना बनाने के लिए तीन-चार लोगों का स्टाफ रखा और फिर एक वैन खरीदी, ताकि सुबह-शाम इन लोगों तक बिना किसी देरी के खाना पहुंचाया जा सके। मेरे दोनों बच्चे हर महीने अपनी पॉकेट मनी से पैसे बचाते हैं, उसे इकट्ठा करते हैं और हर महीने टिफिन सर्विस में लगाने के लिए देते हैं। कई बार स्कूलों के बच्चे मुझसे कहते हैं कि उनके पास पैसे तो नहीं हैं, पर इन बुजुर्गों के लिए कुछ करना चाहते हैं। ऐसे बच्चों को मैं बुजुर्गों के साथ जाकर कुछ वक्त बिताने के लिए कहता हूं। 

आठ वर्ष की उम्र में एक बार मेरे पिता के दोस्त ने एक गुजराती फिल्म में काम करवाया था। लेकिन पढ़ाई और प्रोफेशन की व्यस्तता से इस पर कभी ध्यान नहीं दिया। फिर अचानक से गुजराती धारावाहिक में काम करने वाले एक व्यक्ति से मेरा संपर्क हुआ, जिसके बाद अभिनय का सिलसिला शुरू हो गया। इससे होने वाली आय को मैं टिफिन सर्विस में लगाता हूं। पिछले कुछ वर्षों से इन बुजुर्गों के लिए एक घर बनवाने का प्रयास कर रहा हूं। इसके लिए मैंने मिलाप वेबसाइट पर एक फंड रेजिंग कैंपेन भी चलाया है। 

टिफिन भेजने के साथ मैं इनके स्वास्थ्य की भी देखभाल करता हूं। मुझे जनरेशन गैप की सोच समझ में आती है। कई बार बच्चों का अपने मां-बाप से झगड़ा हो जाता है। पर कोई बेटा अपने मां-बाप को खाना तक नहीं दे, यह बात मुझे न तो बारह साल पहले समझ आती थी और न ही आज समझ में आती है। पर अब मुझे बस इतना पता है कि मैं अपनी अखिरी सांस तक इन बुजुर्गों की सेवा करना चाहता हूं।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित
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