बमबारी से ध्वस्त म्युनिख की गलियों में 29 अप्रैल, 1945 को उथल-पुथल की स्थिति थी। अमेरिकी फौज नजदीक में ही थी। एक दिन बाद यानी 30 अप्रैल को बर्लिन के अपने बंकर में हिटलर ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। महत्वपूर्ण भवनों की रखवाली करने वाले नाजी गार्ड भाग गए थे। भूखे लोगों ने फ्यूहरर (नेता) हिटलर के भवन पर धावा बोला। पहले उन्होंने भोजन, शराब और फर्नीचर लूटा। उसके बाद उन्होंने कलाकृतियों पर हाथ साफ करने का सिलसिला शुरू किया।
विज्ञापन
अमेरिकी सेना के एक आर्ट इंटेलिजेंस ऑफिसर एडगर ब्रेटेनबाख ने 1949 की अपनी रिपोर्ट में लिखा, दूसरे दिन शाम को जब लूट खत्म हुई, तब सारी पेंटिग्स लुप्त हो चुकी थीं। अजीब स्थिति थी। हिटलर ने व्यापक पैमाने पर कलाकृतियां लूटी थीं। और अब उनके अपने ही लोगों ने उनकी लूटी गई कलाकृतियां लूट लीं।
हाल ही में म्युनिख के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ आर्ट हिस्ट्री ने उन खोई कलाकृतियों की व्यापक जांच की है, जो फ्यूहरर के भवन और उससे सटे नाजी मुख्यालय में रखी हुई थीं। वहां ये कलाकृतियां उन एजेंटों ने एकत्रित की थीं, जो इनकी लूट के हिटलर के अभियान में मददगार थे। यही नहीं, उन एजेंटों ने बमबारी से बचाने के लिए उनमें से अधिकांश कलाकृतियों को ऑस्ट्रिया में नमक की खदानों में छिपा दिया था।
विज्ञापन
योजना के तहत इन तमाम कलाकृतियों को हिटलर के गृहनगर लिंज में ले जाना था, जहां वे फ्यूहरर म्यूजिम की शोभा बढ़ातीं। शोधकर्ताओं को म्यूनिख के उन भवनों में अब भी करीब 1,500 कलाकृतियां मिलीं। जबकि दो दिन चली लूट में करीब 700 पेंटिंग्स लूट ली गई थीं।
हालांकि ये पेंटिंग्स भी लूटी गई संपत्ति ही थी, जिन्हें नाजियों ने यहूदियों से हासिल किया था। उदाहरण के लिए, म्यूनिख के दो भवनों में सहेजकर रखी गई कलाकृतियों में से सैकड़ों कलाकृतियां एडोल्फ स्कॉल्स के परिवार से लूटी गई थीं, जो एक फ्रेंच यहूदी थे और जिनके पास पुरानी कलाकृतियों का भारी संग्रह था।
कलाकृतियों की लूट के कई सप्ताह बाद प्रशासन ने करीब 300 पेंटिंग्स की शिनाख्त कर ली। इनमें से अनेक पेंटिंग्स पास के एक आलू के खेत में गड्ढा खोदकर छिपाकर रखी गई थीं। जबकि करीब 30 पेंटिंग फ्यूहरर के भवन से कुछ ही दूर स्थित एक घर में मिलीं। इन कलाकृतियों को खोजने और वापस लाने का काम अमेरिकी सेना से जुड़े मॉनुमेंट्समैन ने किया, हालांकि खोई गई कलाकृतियों की तुलना में वापस मिली कलाकृतियों की संख्या बहुत ही कम थी।
बाद के दशकों में भी खो चुकीं 400 कलाकृतियों की वापसी के लिए जर्मन अधिकारियों ने कुछ नहीं किया। उनकी हिचकिचाहट की एक वजह यह भी रही होगी कि उनके पूर्वजों ने वे कलाकृतियां लूट-खसोट से ही हासिल की थी। हालांकि अब जर्मनी की सरकार उन कलाकृतियों को वापस पाने के मामले में गंभीर है। देर से सही, लेकिन उन्होंने 1945 में हुई कलाकृतियों की चोरी की रिपोर्ट इंटरपोल और जर्मन फेडरल क्रिमिनल पुलिस ऑफिस को दी है। इसके अलावा उन्होंने चोरी गई कलाकृतियों की सूचना देने वाले दो डाटाबेसों में भी इसकी सूचना दी है।
इन कोशिशों से अब करीब तीन दर्जन खोई गई कलाकृतियों की वापसी हुई है। इनमें से एक पेंटिंग यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया के फिशर म्यूजियम ऑफ आर्ट में मिली। उस म्यूजियम को चौदह साल पहले पता चला कि उनके संग्रह में शामिल एक पेंटिंग म्युनिख स्थित फ्यूहरर के भवन से लूटी गई है। जेरार्ड डाउ की यह पेंटिंग, 'स्टिल लाइफ विद बुक ऐंड पर्स' इस म्यूजियम के संग्रह में 1964 में आई, जब एर्मेंड हैमर ने यह उसे उपहार में दिया। हैमर ने यह पेंटिंग 1947 में न्यूयॉर्क में खरीदी थी। लेकिन इसके बारे में इससे अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
दरअसल खोई कलाकृतियों को वापस पाने के रास्ते में एक रोड़ा जर्मनी का कानून भी है, जिसके तहत कोई व्यक्ति अगर किसी वस्तु को दस साल तक अपने पास रखता है, तो वह वस्तु उसकी हो जाती है। इसलिए जर्मनी में अगर 1945 की खोई कलाकृति किसी के पास मिल भी जाती है, तो कानूनी तौर पर सरकार के लिए उससे वह पेंटिंग वापस लेना कठिन है। फिर उस व्यक्ति को तो यह भी मालूम नहीं हो सकता कि उसके पास जो कलाकृति है, वह लूटी हुई है।
इन कलाकृतियों की शोध परियोजना से जुड़े एक कला इतिहासकार स्टीफन क्लिंगन कहते हैं कि ऐसी स्थिति में मैं सरकार को उन कलाकृतियों को खरीदने का सुझाव दूंगा। 'अगर जर्मन सरकार खोई कलाकृतियों को खरीदने की घोषणा करे, तो वह एक अच्छा काम होगा, क्योंकि बहुत से लोगों के पास बीते दौर की पेंटिंग्स होंगी, लेकिन उचित प्लेटफॉर्म के अभाव में वे उन्हें बेच नहीं पाते', स्टीफन कहते हैं।
हालांकि यह भी सच है कि इतने लंबे समय के बाद वापस न मिली कलाकृतियों की वापसी का काम बहुत आसान भी नहीं है। एडगर ब्रेटेनबाख ने 1949 की अपनी रिपोर्ट में बिल्कुल सच लिखा था कि जर्मन जासूस अगर चाहते, तो भोजन और सिगरेट का लालच दिखाकर ही खोई गई कलाकृतियों को आसानी से हासिल कर लेते। जाहिर है, कलाकृतियों के मामले में दशकों पुरानी उदासीनता जर्मनी के लिए बहुत भारी पड़ी है।