मेरा जन्म उत्तरी गुजरात के एक छोटे से गांव में हुआ। मैं गुजराती साहित्य के गढ़ अहमदाबाद से पचहत्तर मील की दूरी पर रहता था। मेरा गांव मुख्यधारा से पूरी तरह से कटा और पिछड़ा हुआ था। मेरा गांव बामना पूरी तरह से ब्राह्मण बहुल था। लेकिन वे ज्यादातर अशिक्षित थे और उनका मुख्य पेशा खेती करना था।
मेरे पिता, जिन्होंने ईसाई मिशनरी स्कूल में प्राइमरी शिक्षा पाई थी, गांव की अपनी छोटी-सी संपत्ति की देखभाल करते थे, लेकिन चाहते थे कि उनका बेटा अंग्रेजी शिक्षा पाए। गांव के स्कूल में शिक्षकों के लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के कारण मुझे चौथी कक्षा में दो साल रहने पड़े, यह देखकर मेरे पिता ने पास के ही एक शहर में मेरा दाखिला करा दिया, जहां मैंने छह साल तक पढ़ाई की। उसके बाद मैं अहमदाबाद पढ़ने के लिए गया।
गांव के जातिग्रस्त और रूढ़िवादी लोग ऐसी भाषा का प्रयोग करते थे, जो बेहद संवेदनशील और अर्थपूर्ण थी। मैंने अपने नाटकों में इसी भाषा का इस्तेमाल किया, जो मेरे लिए काफी मूल्यवान साबित हुआ। पहाड़ी क्षेत्रों के भ्रमण ने मुझे प्रकृति को जानने और प्यार करने में मदद की। मानसून मेलों के भ्रमण ने आम लोगों के उत्साहपूर्ण मनोदशा को मेरे सामने प्रस्तुत किया।
अपने भीतर निहित गीतात्मक लय के संवर्धन के लिए मैं किताबों से ज्यादा उन लोगों का ऋणी हूं। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही मैंने कविता लिखनी शुरू की थी। मानसून के बाद छुट्टी के दौरान मैं अपने दो अन्य दोस्तों के साथ माउंट आबू पर चढ़ जाता था। पहाड़ी चोटी पर नाखी झील के ऊपर शरद पूर्णिमा की चांद को उदित होते देखना एक शानदार अनुभव था।