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'साहित्य को विशिष्ट नहीं, समावेशी होना चाहिए'

Tue, 03 Apr 2018 01:29 AM IST
रिचर्ड फोर्ड
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Richard Ford
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मैं आतिथ्य-सत्कार (होस्पिटैलिटी) का अध्ययन करने के लिए कॉलेज गया था, लेकिन जल्द ही मैंने उसे छोड़ दिया, क्योंकि मैंने महसूस किया कि जो मैं करना चाहता हूं, वह लेखन है। लेखन के लिए अपने दिल की हलचल के कारणों का पता लगाना चाहिए और उसे लिखने का तरीका ढूंढना चाहिए।

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जीवन का मतलब यह नहीं है कि आपके पास क्या है या आपने क्या पाया। इसका मतलब यह है कि आप समाज को क्या देना चाहते हैं। जीवन जीने की कला विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रहना है। अतीत को जितना कम याद रखें, उतना बेहतर। अगर एकाकीपन बीमारी है, तो साहित्य उसका उपचार। कुछ लोगों का मानना है कि लेखकों को सहज रूप से एकांत पसंद है और उस एकाकीपन के प्रति उनके मन में एक प्रकार का रोमांस होता है।

मेरा मानना है कि लेखक वास्तव में स्वीकार्यता पाना चाहते हैं। वे समाज में, संस्कृति में, बुद्धिजीवियों में स्वीकृति पाना चाहते हैं। लेखन ऐसा करने के लिए उनका तंत्र या उपकरण है। मेरा मानना है कि साहित्य को एकांतिक या विशिष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे समावेशी होना चाहिए। मेरी सामान्य धारणा है कि आप अपने स्वयं के अनुभव के आधार पर वह नहीं कर सकते, जो एक किताब किसी के लिए कर सकती है।
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अध्ययन ही वह चीज है, जो संभवतः लोगों को लिखने के लिए प्रेरित करती है। धीमी गति से अध्ययन सामान्यतः एक कमी है, पर मैंने इसे अपनी परिसंपत्ति बनाने का तरीका खोज निकाला। मैं शब्दों के सभी गुणों पर ध्यान देने लगा, इसने शब्दों को मेरे लिए मूल्यवान बना दिया।
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-अमेरिकी उपन्यासकार और लघुकथाकार

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