मैं आठ भाइयों और बहनों के एक बड़े मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुआ था। मेरे पिता एक सरकारी कर्मचारी थे, जो शिमला में पदस्थापित थे। घर में कोई रचनात्मक माहौल नहीं था, पर मुझे नहीं मालूम कि क्यों और कैसे मुझे और मेरे भाई निर्मल वर्मा को लिखने में दिलचस्पी पैदा हुई। हम कहानियां लिखते थे। बाद में मैंने खुद को पेंटिंग और कला के प्रति समर्पित कर दिया, जबकि मेरा भाई निर्मल कहानियां ही लिखता रहा।
1945 में मुझे एक कला प्रदर्शनी में जाने का मौका मिला, मैं उससे इतना उत्साहित हुआ कि मैंने दिल्ली में एक आर्ट स्कूल में शाम की कक्षा में दाखिला करा लिया। उसके एक वर्ष बाद मैंने फ्रांस जाने का फैसला किया। एक तरफ की यात्रा का खर्च मेरे पिता ने उठाया और फ्रेंच कल्चरल काउंसिल से मिले वजीफे के कारण मैं वहां तीन साल तक कलाकारों और कवियों की संगत में रहा। भयानक मानवीय स्थितियों ने मुझे पेंटिंग के लिए प्रेरित किया।
भीड़भाड़ वाले शहरों में भी अलगाव की भावना दिखती थी। पेंटिंग की एक शृंखला बनाने के क्रम में जब मैं और हुसेन 1961 में बनारस गए थे, तो मैंने वहां न सिर्फ शहर, बल्कि सभ्यता और संस्कृति में भी गिरावट देखी। वहां सभी जीर्ण घरों में निराशा पसरी थी, जो कभी खूबसूरत रही होगी। बनारस हमेशा मेरे जेहन में कौंधता है। जिस तरह से यह शहर जीवित और मृत है, इसकी अस्पष्टता मुझे दिलचस्प लगती है। हम वहां घाट पर घंटों बैठे रहते और चित्र बनाते थे। बनारस का मुझ पर न केवल स्पष्ट दृश्यात्मक, बल्कि मनोवैज्ञनिक प्रभाव भी पड़ा।
-मशहूर भारतीय चित्रकार, जिनका हाल ही में निधन हुआ।