स्कूल के शुरुआती दिनों में याद है कि मुझे समय पर पहुंचने के लिए काफी तेज दौड़ना पड़ता था, और तेज धावक होने के कारण मैं अक्सर सफल ही होता था। लेकिन जब भी मुझे संदेह होता था, तो अधीरता से ईश्वर से प्रार्थना करने लगता था, और मुझे याद है कि अपनी कामयाबी का श्रेय मैं हमेशा ईश्वर को देता था, अपने तेज दौड़ने को नहीं। मैंने कई बार अपने पिता और दीदी को यह कहते सुना कि जब मैं काफी छोटा था, तो संन्यासियों की तरह डग भरता था, लेकिन मुझे ऐसा कुछ याद नहीं आता है।
कई बार मैं अपने आप में खो जाता था। जब मैंने स्कूल छोड़ा तो मैं अपनी उम्र के मुताबिक न तो बहुत मेधावी था और न ही एकदम निखट्टू, लेकिन मेरे सभी मास्टर और मेरे पिता मुझे बहुत ही सामान्य लड़का समझते थे, बल्कि बुद्धिमानी में सामान्य पैमाने से भी नीचे ही मानते थे। मेरे पिता व्यक्तित्व के गहरे पारखी थे, और उन्होंने मेरे लिए एक दिन कहा था कि मैं एक सफल डॉक्टर बन सकता हूं। वह यह भी मानते थे कि सफलता का मुख्य तत्व है, आत्मविश्वास; पर मेरी जिस बात ने उन्हें प्रभावित किया था, वह यह कि मैं जो कुछ नहीं भी जानता था, उसके प्रति भी मन में आत्मविश्वास पैदा कर लेता था।
स्कूली जीवन के दौरान मुझमें कुछ ऐसे गुणों का भी विकास हो रहा था, जो भविष्य की आधारशिला थे, जैसे कि मेरी रुचियां विविधतापूर्ण थीं। जिस चीज में मेरी रुचि होती थी, उसके प्रति मैं उत्साह से भर जाता था, और किसी भी जटिल विषय या चीज को समझने में मुझे बहुत आनंद आता था। विज्ञान के अलावा मेरी रुचि अलग-अलग किताबों में भी थी। काव्य से मिलने वाले आनंद के बारे में एक घटना बताता हूं कि 1882 में वेल्स की सीमाओं पर हम घुड़सवारी कर रहे थे और दृश्यों में जो जीवंत रंग काव्य ने भरा था, वह मेरे मन पर किसी भी आनंद की तुलना में कहीं अधिक समय तक बना रहा।