आज बाजार अंतरराष्ट्रीय और बेहद आक्रामक है। वह फौजें भेजकर देशों पर कब्जा ही नहीं कर रहा, मीडिया के माध्यम से सारे समाजों को खरीदारों में तब्दील कर रहा है। दूसरे देशों के प्राकृतिक और अन्य संसाधनों पर कब्जा करने की हिंसक होड़ में वह अधिक खूंखार हो गया है- वह धर्म, राष्ट्रीयता, संस्कृति, भाषा- यहां तक कि आपसी संबंधों में भी तोड़-फोड़ मचाए है। रोज एक देश दूसरे पर हमला करता है, धार्मिक युद्धों का बाकायदा आयोजन किया जाता है और देखते ही देखते सरकारें बदल जाती हैं।
चलायमान पूंजी की यह तानाशाही, लगता है कि कुछ ही दशकों में हमारा सारा हुलिया बदल देगी। धर्म के वर्चस्व को अगर जाति-चेतना तोड़ती है, तो जातियों की प्रतिद्वंद्विता को बाजार वही नहीं रहने देता। 'हटिंगटन' या अमेरिकी प्रचार-तंत्र भले ही कहता रहे कि यह 'सभ्यताओं की मुठभेड़' है और इस्लामिक-ईसाई सभ्यताएं अब ऐसे मृत्युपाश में फंस गई हैं कि उनमें से एक को समाप्त होना ही है और समाप्त होने वाली सभ्यता इस्लाम है, क्योंकि वह मानसिक रूप से डेढ़ हजार साल से आगे नहीं बढ़ पाई है, जबकि क्रिश्चियेनिटी एक गतिशील, डायनैमिक सभ्यता है।
विचार से लेकर वैज्ञानिक संसाधनों में वह इतनी शक्तिशाली है कि इस्लाम की सामंती सोच उसके सामने कहीं ठहरती ही नहीं है। वस्तुतः तेल जैसे प्राकृतिक संसाधनों के सिवा इस्लाम के पास आज कुछ भी ऐसा नहीं है, जो पश्चिम की दुनिया को नचा सके। हां, उसके पास धार्मिक कट्टरता जरूर ऐसी है, जो आतंकवादी पैदा करके लड़ाई जीत लेने के शेखचिल्ली सपने देखती है।
-कानपुर से आबाद अली