स्नान पर्व की घड़ी, मोमबत्ती-सा जलता सूरज, जनवरी की सफेद धुंध पर पिघलता हुआ। अनेक प्रार्थनाओं से जुड़ा शोर-जो शोर नहीं है, न आवाज है, न कोलाहल-सिर्फ मनुष्य का अपनी आत्मा से एकालाप, जिसे सिर्फ बहता पानी सुन सकता है। यह पानी इन आवाजों को अपनी धड़कन में पिरोता हुआ किस विराट मौन सागर में लीन हो जाएगा, कोई नहीं जानता।
दोनों धाराओं के बीच एक-एक काली रेखा दिखाई देती है। मैं समझता हूं यह कोई दीवार है, संगम के बीच हिलती, धुलती, बदलती लाइन। लोग आते हैं, लाइन में डुबकी लगाते हैं और फिर अपनी जगह दूसरों को दे देते हैं और वह नर-सेतु ज्यों-का-त्यों कायम रहता है। हर क्षण बदलता हुआ, किंतु अपनी संपूर्णता में स्थिर और गतिहीन। अब एक भी कदम उठाना असंभव है।
यहां भीड़ इतनी घनी है कि स्त्री-पुरुष गंगा की मटियाली धार में ही नहाने लगे हैं। संगम से दो गज इधर या उधर, क्या फर्क पड़ता है। पुलिस के सिपाही लाइन बनाकर खड़े हैं-तटस्थ, शांत, ध्यानावस्थित। मैंने भारतीय पुलिस को इतना शांत कम ही देखा है, इसलिए उत्सुकता से उनकी आंखों का अनुकरण करता हूं और पाता हूं कि समूची बटालियन अटेंशन की मुद्रा में नहाती हुई औरतों को देख रही है। रात भर के जगे सिपाहियों को सुबह का यह दृश्य जरूर एक स्वप्न-सा जान पड़ता होगा।
तभी एक धक्का लगता है। एक पच्चीस-तीस वर्ष का युवक भीड़ को चीरता हुआ पुलिस इंस्पेक्टर के पास आ खड़ा हुआ है, गिड़गिड़ाते स्वर में कुछ कह रहा है, 'यहां साइकिल पर?' इंस्पेक्टर साहब आश्चर्य से युवक को देखते हैं, 'आपको मालूम नहीं, यहां कोई भी वाहन नहीं आ सकता।' 'जी, मेरी बात तो सुनिए।'
उसकी बात सुनी तो पता चला कि उसके अस्सी बरस के बाबा सैकड़ों मील की दूरी से प्रयाग से चले आए हैं, किंतु अपनी झोपड़ी से संगम पैदल चलकर नहीं आ सकते। क्या वह उन्हें साइकिल पर बिठाकर नहीं ला सकता?
इंस्पेक्टर थोड़ा नर्म पड़ते हैं। 'अच्छा, ले आइए, लेकिन देखिए उन्हें आपको अलग नहलाना होगा, साइकिल समेत नहीं।' दस मिनट बाद उन्हें दोबारा देखता हूं। वह एक पुरानी, जर्जरित साइकिल को घसीटता आ रहा है, पहिये बार-बार गीली रेत में रपट जाते हैं। वह घबराकर इधर-उधर देखता जाता है कि कोई दूसरा सिपाही उसे न रोक ले। किंतु पीछे कैरियर पर बैठा यात्री बिल्कुल अटल और निश्चित है। आंखें मुंदी हुईं, मुंह खुला हुआ, ठुड्डी पर थूक की लार बह रही है। नीचे लटकते पैर रेत पर रगड़ते जा रहे हैं, जिसका उन्हें कोई ध्यान नहीं। पूरी एक जि़ंदगी साइकिल पर घिसट रही है। उन्होंने अपना सिर सीट पर रखी मैली पोटली पर टिका रखा है।
साइकिल की चरमराहट में पता नहीं चलता कि ढीले कल-पुरजों की आवाज कितनी है, बूढ़ी हड्डियों की खटखटाहट कितनी? हर टूटी हुई सांस उन्हें अपनी यात्रा के अंत की ओर ठेलती जा रही है। कैसा अंत? क्या कोई ऐसी जगह है, जिसे हम अंत कहकर छुट्टी पा सकें? जिस जगह एक नदी दूसरी में समर्पित हो जाए और दूसरी अविरल रूप से बहती रहे, वहां अंत कैसा? हिंदू-मानस में कोई ऐसा बिंदु नहीं, जिस पर अंगुली रखकर हम कह सकें, यह शुरू है, यह अंत है। यहां कोई आखिरी पड़ाव, 'जजमेंट डे' नहीं, जो समय को इतिहास के खंडों में बांटता है।
नहीं, अंत नहीं है और मरता कोई नहीं, सब समाहित हो जाते हैं, घुल जाते हैं, मिल जाते हैं। जिस मानस में व्यक्ति की अलग सत्ता नहीं, वहां अकेली मृत्यु का डर कैसा? मुझे रामकृष्ण परमहंस की बात याद हो आती है, 'नदियां बहती हैं, क्योंकि उनके जनक पहाड़ अटल रहते हैं।' शायद इसीलिए इस संस्कृति ने अपने तीर्थस्थान पहाड़ों और नदियों में खोज निकाले थे-शाश्वत अटल और शाश्वत प्रवाहमान। मैं एक के साथ खड़ा हूं, दूसरे के साथ बहता हूं।