पिछले 2 महीनों से जारी घमासान विराम पर आ चुका है। यह स्पष्ट हो गया है कि पांचों राज्यों में किसकी सरकार बन रही है। यहां तक कि उत्तराखंड मणिपुर और गोवा जैसे राज्यों में भी जोड़-तोड़ की गुंजाइशों से परे, पूर्ण बहुमत के साथ बीजेपी की सरकार बनी है। यह बीजेपी के लिए अपेक्षाओं से परे सफलता कही जा सकती है।
उत्तर प्रदेश में 6000 किलोमीटर की यात्रा और 272 विधानसभा सीटों को मैंने amarujala.com के लिए कवर किया। 2 महीने की यात्रा में उत्तर प्रदेश के मिजाज को जितने करीब से जाना, उतने करीब से किसी अन्य राज्य को नहीं। जिस वक्त मैं उत्तर प्रदेश में था तब लग रहा था कि बीजेपी 300 के आंकड़े को छूने का दावा यूं ही नहीं कर रही। इसके बाद समाजवादी पार्टी की रैलियों, गठबंधनों, बीजेपी से टूटकर सपा में आने वालों आदि का दौर शुरू हुआ।
इसके बाद से माहौल बदलना शुरू हुआ और लोगों को लगने लगा कि अखिलेश यादव एक तगड़ी लड़ाई देने जा रहे हैं, उन्होंने लड़ाई लड़ी भी। उनकी सीटें, वोट शेयर काफी बढ़ा है और जिन सीटों पर वह हारे हैं, वहां भी उनके प्रत्याशियों ने सीधी टक्कर बीजेपी को दी है। कुछ जगहों पर तो बहुत ही नजदीकी मुकाबला रहा है।
मेरा विश्लेषण, मैंने चुनाव के पहले ही कह दिया था। यहां तक कि 'सत्ता का संग्राम' के कार्यक्रमों में आप इसको अब भी सुन सकते हैं, जहां एक ही मंच पर बीजेपी के खिलाफ बोलने के लिए बीएसपी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता-नेता होते थे। शो में बहुत हो हल्ला होता था और बीजेपी बुरी तरह से घिर जाती थी। फिर मेरा सवाल होता था कि यही तो बीजेपी की ताकत है आप एक ही चीज में साथ हैं, वह है बीजेपी को घेरना, लेकिन मतदाता इस विधि से नहीं चलता। उसे तो आप में से किसी एक को चुनना है।
लचर दिखा विपक्षी खेमा
आप नतीजों में सीटों के समीकरण देखेंगे तो बहुजन समाज पार्टी, जो कि इन चुनावों में साफ होती दिखती है, वह साफ नहीं हुई है बल्कि उसने कड़ी टक्कर दी है, लेकिन यह कड़ी टक्कर उसके लिए फायदा साबित होने के बजाय समाजवादी पार्टी के लिए खतरनाक साबित हुई। यही हाल कांग्रेस के कुछ प्रत्याशियों का रहा है। हालांकि कांग्रेस को दो से 3 सीटों से ज्यादा की उम्मीद मैंने पहले भी नहीं जताई थी।
अब यदि मुद्दों की बात करें तो मेरे लिए उत्तर प्रदेश का पूरा चुनाव बिल्कुल भी चौंकाने वाला नहीं रहा, क्योंकि जमीन पर जाकर जब लोगों से बात की, तो तीन चार बातों में ही सारे मुद्दे सिमटकर आ गए थे।
बीजेपी के पक्ष के मुद्दों की बात करें तो अपराधियों पर लगाम, ऑर्गेनाइज्ड क्राईम को खत्म करने का दावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार द्वारा दी गई योजनाओं की एक लंबी लिस्ट, जिस पर पक्ष-विपक्ष की लंबी बहस होती थी, लेकिन फिर भी बताने के लिए बहुत सारी योजनाएं थे। उदाहरण के लिए पक्के मकान बनाना, शौचालय बनाना, उज्वला योजना, मुफ्त राशन आदि इत्यादि।
बेरोजगारी बना रहा बड़ा मुद्दा
यदि बीजेपी के खिलाफ और समाजवादी पार्टी के पक्ष के मुद्दों की बात करें तो बेरोजगारी पर बीजेपी बुरी तरह से घिरी, क्योंकि वह युवा जो प्रधानमंत्री मोदी और योगी के चेहरे से प्रभावित थे, वह भी बेरोजगारी पर उनसे नाराज दिखे। कई परीक्षाओं में लीक होने वाले पर्चों ने भी युवाओं की नाराजगी बढ़ाई। दूरस्थ ग्रामीण इलाकों से शहरों में 1 दिन पहले आकर अपने एग्जाम के लिए रुकने वाले बच्चों के जब पेपर लीक होते हैं, तो उन्हें किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, इसे भी मैंने बहुत नजदीक से देखा। हालांकि यह बात तभी स्पष्ट हो गई थी कि चुनाव में यह बहुत बड़ा मुद्दा नहीं होगा।
पुरानी पेंशन बहाली, आशा बहनों का मुद्दा, आंगनवाड़ी की बहनों के पैसे बढ़ाए जाने का मुद्दा, ऐसी बहुत सी बातें मेरे सामने आई, जिसमें सरकार से बहुत मांगे रखी गई थी। यहां तक कि पुरानी पेंशन बहाली को लेकर कई जगहों पर मैंने प्रदर्शन भी होते देखे।
जब भी चुनाव आते हैं तो प्रदर्शनकारी इसे एक संभावनाशील समय की तरह लेते हैं क्योंकि उन्हें पता है यही वह समय होता है जब नेता और पार्टियां उनकी बातों को सुनते हैं। हालांकि इस मुद्दे के बारे में भी स्पष्ट था कि यह चुनावी मुद्दा या वोटों में परिवर्तित होने वाला मुद्दा नहीं बनेगा।