गढ़वाल का विख्यात रामी बौराणी गीत और नाटक उस जमाने के पलायन का आईना है।
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रामी बौराणी की लोक कथा भी पलायन का संन्यास पक्ष
पहाड़ से आने वाले बच्चों में से कुछ तो मैदानों में धक्के खाकर कुछ ही समय बाद लौट आते थे तो कुछ दशकों बाद अपने बाल बच्चों समेत या अकेले गांव लौटते थे। कुछ साधारण हालत में तो कुछ सम्पन्न व्यवसायी या नौकरी पेशा के तौर पर लौटते थे। कुछ बच्चे एक बार गये तो फिर कभी नहीं लौटे। कुछ ऐसे भी होते थे जो आदित्यनाथ की तरह जोगी बन कर कभी कभार लौटते थे जिन्हें माता पिता तक नहीं पहचान पाते थे।
गढ़वाल का विख्यात रामी बौराणी गीत और नाटक उस जमाने के पलायन का आईना है। इस नाटक में एक पति पूरे 12 साल बाद साधू वेश में अपने गांव आता है तो उसकी पत्नी रामी उसे नहीं पहचान पाती है। रामी बौराणी की यह लोक कथा पहाड़ी नारी के स्त्रित्व और पति के प्रति बफादारी की एक मिसाल भी है। जो कि 12 साल तक पति की प्रतीक्षा करने के बाद भी परपुरुष की छाया भी सहन नहीं करती।
यह विडम्बना ही है कि पहाड़ छोड़ कर मैदान आये कुछ लोगों ने अपनी नई गृहस्थी बसा दी और पहाड़ी गांव में रह रही पत्नी को जीतेजी विधवा की तरह जीने को मजबूर कर दिया। इस वर्ग में कई राजनेता गिनाये जा सकते हैं, जिनमें से कुछ राष्ट्रीय स्तर के नोता भी रहे।
पहाड़ के भागे हुए बच्चे विख्यात बन कर भी लौटे
पहाड़ों से दूर नई दुनिया की कल्पना लेकर पहाड़ से भागे हुए कुछ बच्चों ने बहुत तरक्की कर मिसाल भी पेश की जिनमें बदरी प्रसाद बमोला भी एक थे।
डॉ. योगेश धस्माना के अनुसार-
बद्री प्रसाद एकमात्र शर्त बंद कुली थे जिन्होंने 1890 से लेकर 1894 तक स्वयं मजदूरी की। एक बंधुआ मजदूर के रुप में कार्य करने वाले बदरी प्रसाद बमोला रुद्रप्रयाग के ऐसे अज्ञात पहाड़ी व्यक्ति थे जिन्होंने फिजी में गन्ने की खेती में लगे भारतवर्षीय लोगों को न सिर्फ अंग्रेजों की बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया बल्कि फिजी में एक सशक्त राजनीतिक दल का गठन कर उसका नेतृत्व भी किया और स्वयं भी संसद में पहुंचकर प्रतिपक्ष के नेता के पद को सुशोभित किया। उस जमाने में फौज में भर्ती होने के शैक्षिक योग्यता के बजाय शरीर शोष्टव और युद्ध में जाने का हौसला देखा जाता था, इसलिए घर से भागे हुए पहाड़ी बच्चे किशोरावस्था पार करने के बाद लैंसडौन और रानीखेत पहुंच कर भर्ती हो जाते थे और फिर सैनिक के रूप में घर पहुंचते थे। कुछ बच्चे कोटद्वार, रामनगर और हल्द्वानी में बसों और ट्रकों में क्लनरी करने के बाद ड्राइवर बन कर घर लौटते थे।
सन्यासी बन कर लौटे बेटे को माता भी नहीं पहचान पाती थी
जब बच्चा जवान होकर घर लौटे तो उसे पहचानना आसान नहीं होता। खास कर साधू वेश में लौटे सख्श को पहचानना तो लगभग नामुमकिन ही है, इसीलिए कई बार कुछ ठग साधू वेशधारी दशकों पहले घर से भागे हुए बच्चे के घर पहुंच कर उनकी भावनाओं का दोहन भी करते थे। कोई भी सामान्य व्यक्ति साधरणतः सन्यासी नहीं बनता। योगी आदित्यनाथ की तरह बाल बैरागी बहुत कम होते हैं। लेकिन ज्यादातर मजबूरी में सन्यास धारण करने को विवश हो जाते हैं।
महिला सन्यासिनों की कहानिया ंतो और भी अधिक दारुण होती है। इसलिये बारह बरसों बाद अजय मोहन की तरह कोई सन्यासी अपनी मां के पास पहुंच जाय तो वे अत्यंत मार्मिक क्षण होते हैं। काश हर पहाड़ी ब्वे (मां) और ईजा का लाडला अजय मोहन की तरह विख्यात आदित्यनाथ बन कर लौटता!