कश्मीर की महान नायिकाएं और स्त्री देश
यशोवति, सुगंधादेवी, दिद्दा, कोटा देवी, इशान देवी, वाक्पुशटा, श्रीलेखा, सूर्यमती, कलहानिका, सिल्ला, चुड्डा, लछमा, बीबी हौरा ये तरह स्त्रीदेश की महनायिकाएं हैं।
दरअसल, ये सिर्फ नाम भर नहीं हैं। ये कश्मीर और भारत के गौरवशाली इतिहास के वो पन्ने हैं जो कभी पलटे ही नहीं गए। चाहे वो पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम हो, लोकतंत्र हो, कर सुधार व्यवस्था हो, नहर व्यवस्था हो, भवन निर्माण तकनीक हो, वर्तमान ओपन हॉल संवाद संस्कृति हो ,पहली ब्लैक कमांडो फोर्स हो, सबकी नींव यहीं हमारे भारत और कश्मीर में अलग अलग समय में इन रानियों ने रखी।
इतना ही नहीं, कई कठिन परिस्थितियों में विदेशी आक्रांताओं से देश की सीमा पर युद्ध करके उसको पटकनी देने वाली भी यही महिलाएं ही थीं।
स्त्रीदेश अपनी तरह का एक ऐसा पहला दृश्य श्रव्य दस्तावेज है जो इस तरह महिलाओं की शोध परख कहानियां सामने लाकर उनका दस्तावेजीकरण कर रहा है। 'स्त्रीदेश ' एक तरह से इन सभी महानायिकाओं से आपका प्रथम परिचय कराता है। इसी दौरान मैंने और मेरी टीम ने ये फैसला किया कि हम इन रानियों और इनमें छुपी रोल मोड़ल्स को देश के सामने उनकी पूरी कहानी के तौर पर एक एक कर के लाएंगे।
वो कहानियां न सिर्फ शोध परख होंगी बल्कि उनको लिखने का ढंग इस कदर रोचक और सिनेमाई होगा कि इतिहास मनोरंजन के कैप्सूल में लपेटकर पाठकों को परोसा जाए। कहानी की रोचकता इतिहास के भारीपन को हर ले। सबसे पहली किताब रानी दिद्दा पर लिखकर दुनिया के सामने रखी।
पितृसत्तात्मक समाज में एकलंगड़ी रानी के महायोद्धा और साम्राज्ञी बनने की इस कहानी को पाठकों का भरपूर प्यार भी पिछले दो साल से मिल रहा है। पढ़ने वाले अक्सर ये कहते पाए गए कि इस कहानी को पढ़ते वक्त उन्हें ऐसा लगा कि वो सिनेमा देख रहे हैं। यही तो हम चाहते थे, उपन्यास लिखने का ये अपनी तरह का अनूठा तरीका सफल रहा।
ऐसे ही स्त्रीदेश को धुरी बनाकर हर एक कहानी एक एक कर के दुनिया के आगे रखने का मिशन जारी है। पाठकों के अलावा ध्यान बच्चों और किशोर-किशोरियों पर भी है कि उन तक भी कॉलेज और स्कूल्स के ओपन फोरम्स और एनीमेशन फिल्म शृंखला के जरिया पहुंचा जा सके। बात एक फीचर फिल्म और वेब सीरीज की भी चल रही है।
मिशन सिर्फ एक है इन महानायिकाओं को वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों से इस कदर परिचित करा देना कि जोश, ऊर्जा, इतिहास के प्रति सही समझ, महिलाओं के लिए रवैय्या और अपनी विरासत पर भरपूर गर्व 'सिखाने -समझाने ' की जरूरत न पड़े। मेरी समझ में, इन कहानियों को कोई कहने वाला चाहिए था, सुनने वाले तो तैयार खड़े हैं।
कश्मीर और देश की इन 13 महानायिकाओं ने मुझे इस अपने तरह के अनूठे और पहले काम के लिए चुना जिसका फक्र है। विगत् मार्च में महिला दिवस के उपलक्ष्य में दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला संस्थान में मेरी फिल्म 'स्त्रीदेश' न सिर्फ लांच हुई, बल्कि इन महिलाओं की जिन्दगी पर विमर्श का सिलसिला भी चल निकला। कोशिश जारी है कि ये विमर्श बेरोक-टोक जारी रहे और ये महानायिकाएं 'आत्मनिर्भर भारत ' के स्मृति पटल पर आगे सदियों तक अंकित रहे। नया 'आत्मनिर्भर भारत ' ये याद रखे कि इसकी नींव स्त्रीदेश कश्मीर ने ही रखी है।
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