भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं और चुनौतियां
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मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी
भारत में मानसिक स्वास्थ्य के लिए पेशेवर सुविधाओं का भारी अभाव है। यह भी एक वजह है कि लोग मानसिक परेशानियों के बावजूद भी पेशेवर मदद लेने से परहेज़ करते रहते हैं। क्योंकि उन्हें बिना जाने-समझे कठघरे में खड़े किए जाने का भय रहता है। यह क़ानून इस दिशा में सकारात्मक दृष्टि दिखाता है कि समाज अपनी सोच में बदलाव लाए। मानसिक बीमारियों को लेकर पीढ़ियों से चली आ रही अवधारणाओं को कानून कटघरे में खड़ा करता है और उनको संस्थागत तरीक़े से शनैः शनैः बदलने की सिफारिश करता है। जो इस अधिनियम का सर्वाधिक उज्जवल पक्ष है।
विशेषज्ञ बिल में मानसिक रोगी को परिभाषित करने के तरीके को लेकर सर्वाधिक चिंतित है। अधिनियम मानसिक बीमारी को जैसे परिभाषित करता है वह बहुत उलझी हुई और अस्पष्ट है।
“मानसिक रोग सोचने, मूड, ख़्यालात, नज़रिए या फिर याददाश्त में आई गड़बड़ी है”। जिससे किसी इंसान की रोजमर्रा के फैसले लेने की क्षमता पर बुरा असर पड़ा हो। शराब और ड्रग लेने से जो मानसिक अवस्था हो जाती है, उसे भी इस के दायरे में ही रखा गया है। यह कोई परिपक्व और वैज्ञानिक समझ नहीं दिखती है। दूसरी बड़ी उलझी और अस्पष्ट सी बात यह है कि मानसिक स्वास्थ्य के पेशेवर वे सब हो सकते है जो जिनके पास ‘मनोविज्ञान एवं मानस रोग, होम्योपैथी, आयुर्वेद या यूनानी पद्धति की पोस्ट-ग्रेजुएट डिग्री है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी संस्थाएं इस कानून के इन प्रावधानों पर गंभीर सवाल उठा रही हैं।
फिर भी एमएचसीए एक्ट भारत में मानसिक रोगियों के लिए एक आशा की किरण तो लेकर आया ही है। कुछ भी न सही यह अधिनियम उन कुछ बुनियादी चिंताओं को तो अपने केन्द्र में रखता दिखता है। यह क़ानून मानसिक रोगियों को जहां इलाज के कई विकल्प मुहैया कराता है वहीं ख़ुदकुशी के प्रयासों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालता है।
बिल बड़ी राहत यह देता है कि मानसिक रोगियों को दिए जाने वाले बिजली के झटकों की उपचार तकनीक को प्रतिबंधित करता है। मानसिक स्वास्थ्य बिल चिकित्सा बीमा पॉलिसी के तहत किसी भी तरह की मानसिक बीमारी को मेडीक्लेम के लिए बीमा कंपनियों द्वारा सूचिबद्ध करने को अनिवार्य बनाता है। साथ ही मानसिक-मंदता को मनोरोग की श्रेणी से बाहर निकालता है। ये पहल मानसिक रोगियों के लिए बहुत बड़ी राहत है।
मानसिक स्वास्थ्य के संकटों से निपटने के लिए एक प्रभावी ढ़ांचा और नीतियां किसी राष्ट्र की बड़ी जरूरत है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत की लगभग 7.5 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में मानसिक रुग्णता का शिकार है। विश्व में मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की समस्या से जूझने वालों में भारत का हिस्सा 15 प्रतिशत तक पहुंच गया है। डब्लू.एच.ओ. का एक पूर्वानुमान है कि इस दशक में भारत की लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्या यानी लगभग 30 करोड़ से भी ज्यादा लोग किसी न किसी प्रकार के मानसिक विकार की चपेट में होंगे। इस दिशा में हमारे प्रयास अभी भी नाकाफी है।
मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम की चिंता के केन्द्र में ये सभी बातें हैं पर अभी भी असल वजह जो मानसिक रोगियों के जीवन से जुड़ी है वह कहीं न कहीं छूट रहा है। जो मानसिक विकारों की प्रमुख वजह बन रही है। समाज को सशक्त करने और अपने सामुदायिक जीवन को बहाल करने की तैयारियां अभी भी हमारी प्राथमिकता में नहीं दिख रही है। मानसिक स्वास्थ्य की देख-रेख का यह पिद्दी का बज़ट ऊंट के मुह में जीरा ही है। इस संकट को भयावह होने से रोकने के लिए सामाजिक सशक्तीकरण के जबरदस्त अभियानों की जरूरत है। जो हमारे सामुदायिक स्वास्थ्य को दुरुस्त करने में मददगार बने। यह हमारे समाजीकरण की प्रक्रिया से लेकर सामाजिक संबंधों, सामाजिक परिवेश और सामूहिक अंतःक्रियाओं पर निर्भर करता है।
व्यक्तित्व के आयाम पर निर्भर है मानसिक स्वास्थ्य
किसी का भी व्यक्तित्व चार आयामों पर टिका है शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और भावनात्मक। शारीरिक आयाम हमारी कार्य-क्षमताओं से जुड़ा है तो मानसिक आयाम हमारे सोचने-समझने व विचारने से और बौद्धिक आयाम बुद्धि की तीव्रता व क्षमता से संबंधित है। जो जीवन-निर्णयों की दिशा तय करता है। भावनात्मक आयाम प्रतिकूल तनावपूर्ण स्थितियों में हमें भावनात्मक स्थिरता देता है। जिससे हमारे दैनन्दिन सामाजिक जीवन के व्यवहार प्रतिमान तय होते है। जो सामाजिक संबंधों के निर्माण और निर्वहन का आधार है। इसलिए भावनात्मक स्वास्थ्य शारिरीक स्वास्थ्य से भी महत्वपूर्ण है।
एक पूर्ण और रचनात्मक जीवन को जीने की क्षमता व जीवन की अनिवार्य चुनौतियों से निपटने वाला लचीलापन हमें हमारी इमोशनल हेल्थ से ही मिलता है। व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य का पूरा दारोमदार उसके भावनात्मक स्वास्थ्य पर निर्भर रहता है। जिसकी जड़ें हमारे संबंधों और सामाजिक जीवन में निहित होती है। सामाजिक जीवन दुरुस्त है तो हम मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे ही और अपने समाज-जीवन को गुणवत्तापूर्ण सामाजिक संबंधों के साथ आनन्दपूर्वक जी रहे होंगे। हमारी इमोशनल हेल्थ हमारी प्रसन्नता की गुणवत्ता की निर्धारक है।
मानसिक स्वास्थ्य के वास्तविक मानक हमारे सामाजिक संबंध हैं। हमारे संबंधों की गुणवत्ता से हमारे मानसिक स्वस्थ्य के स्तर का पता चलता है। इसलिए स्वस्थ समाजिक जीवन का होना बेहद जरूरी है। इसके लिए जरूरी नैतिक मूल्यों और प्रतिमानों की प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है। यही वजह है किसी भी दौर का समाज रहा हो या व्यवस्था रही हो, सबके प्रयास एक आदर्श समाज संहिंता की स्थपना के रहे है। ताकि समाज के जरिए एक अच्छा व्यक्ति-निर्माण अभियान जारी रह सके।
समाज-व्यवस्था में निरन्तरता बनी रह सके। पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वस्थ व्यक्ति स्वस्थ मानसिकता के साथ एक सभ्य, समृद्ध, शांतिपूर्ण और समरस समाज के निर्माण में संलग्न रह सके। यही सभ्यता के विकास का क्रम रहा है और मनुष्य के जंगली हिंसक-बर्बर जीवन से उभरने की मानव मस्तिष्क की सफल कोशिश। इसी मानवीय प्रतिभा ने सामाजिक संस्थाओं के संयुग्मन से सुन्दर सांसारिक जीवन की रचना की है। जो सामाजिक संबंधों की एक विहंगम व्यवस्था है जिसके केन्द्र में व्यक्ति है। व्यवस्थाओं को बनाना भी और उनसे मुक्ति पाना भी सबकी धुरी व्यक्ति है।
दुनियां के सारे ध्वंश, निर्माण, संघर्ष, क्रांति और आन्दोलन व अभियान मानव मस्तिष्क की ही उपज है। जो व्यक्ति ने ही व्यक्तियों द्वारा व्यक्तियों के लिए किए हैं। व्यक्ति समाज की प्राथमिक इकाई है। इसलिए व्यक्ति और उसके मस्तिष्क दोनों का स्वास्थ्य सृष्टि के स्वास्थ्य की तरह है। जिस पर शेष सारी व्यवस्था निर्भर करेगी। इस दृष्टि से मानसिक स्वास्थ्य किसी भी व्यक्ति, समूह, समाज या राष्टृ के लिए केन्द्रीय चिंता का विषय होना ही चाहिए।
कानून का निष्कर्ष
इस क़ानून की खूबियां और खामियां घटती-बढ़ती रहेंगी। पर 21वीं सदी के मुहाने पर भारत का इस दिशा में एक कदम बढ़ाना शुभ संकेत है। समय के साथ-साथ क़ानून को प्रभावी और परिणामी बनाना हमारी प्रतिबद्धताओं पर निर्भर करेगा। अधिनियम को पूरे देश में सही से लागू करने के लिए लगभग 1 लाख करोड़ रुपये की प्रति वर्ष आवश्यकता होगी। इस दृष्टि से कानून का आर्थिक पक्ष निर्णायक है।
“मानसिक स्वास्थ्य संरक्षण क़ानून” का लाभ समाज को तभी मिल सकता है जब गंभीरता से इस दिशा में संसाधन मुहैया कराए जाएं। मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के साथ-साथ स्वस्थ समाज निर्माण के कार्यक्रम जागरूकता अभियानों की शक्ल में प्रभावी भूमिका निभाएं। सामुदायिक जीवन मजबूत हो और समाज को सशक्त बनाने वाले सामाजिक संबंधों में सुदृढ़ता आएं, सामाजिक संस्थाएं अपना कार्यभार मुस्तैदी से संभालें, क्योंकि उपचार से बेहतर है बचाव। समाज का पुनर्निर्माण भी ऐसे अधिनियमों की चिंता का विषय बने तभी एक सशक्त, सफल और समग्र कानून की भूमिका में मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम परिलक्षित होगा। स्वस्थ भारत ही सशक्त भारत बन सकेगा और अंततः श्रेष्ठ भारत।
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