मिंघेरिया की पच्चीस हजार की आबादी में आधे ईसाई थे, मुस्लिमों के अट्ठाइस सेक्ट थे। इनमें विचारों को लेकर सदैव टकराव रहता। एक-दूसरे पर विश्वास न था। मुस्लिम और यूनानी संग रहते हैं मगर वे एक-दूसरे को जानते-समझते नहीं हैं।
प्लेग से बचाव के लिए क्वारन्टीन की व्यवस्था की जा रही है, मगर क्वारन्टीन के नियम मानने को अधिकांश लोग राजी नहीं हैं। मुनादी के बावजूद लोग झुंड में घूम रहे हैं, मजे में खा-पी रहे हैं। चर्च और मस्जिद जाने वाले लोगों को समझाना कठिन है। प्लेग के चूहे फेंकने की, प्लेग फैलाने की अफवाहें फैल रही हैं। कारागार का बुरा हाल है, जो एक बार वहां भेज दिया जाता है, दोबारा नजर नहीं आता है। ‘ओटोमन साम्राज्य की कोई समस्या किसी को जेल में डाले बिना हल नहीं हो सकती है।’ लाशों के ढ़ेर हैं, उन्हें समुद्र किनारे खाई में फेंक दिया जा रहा है।
विज्ञान और आस्था का द्वंद्व है। प्लेग से जब लोग पटापट मरने लगते हैं, तो वैज्ञानिक चेतना के लोगों का विश्वास भी हिल जाता है। धर्म पर आस्था रखने वालों को ऊपर वाले पर भरोसा है। ‘हम अल्लाह के हाथों में हैं!’ मजीद कहता है। ‘चिढ़ो मत; हमारी किस्मत पहले ही लिखी जा चुकी है, और जो आने वाला है उसके लिए हमें चिंता नहीं करनी है!’ ‘हम सब हमारी मदर मेरी और जीसेस क्राइस्ट के हाथ में हैं !’ नाई ने दुकान के कोने की ओर नजर डालते हुए कहा।
पामुक 700 पन्नों में महामारी, मनुष्य का स्वभाव, राष्ट्रवाद, शासन की बुराइयों, मिथक, तुर्की का दूसरे खासकर यूरोप के देशों से संबंध, इतिहास, सब एक परिकथा की तरह पिरोते चले जाते हैं। सब कुछ सुल्तान की भांजी राजकुमारी पाकीजे के पत्रों से जाना जाता है, मगर कहानी कहने वाले का खुलासा ‘नाइट्स ऑफ प्लेग’ में बहुत बाद में होता है।
-----------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।